Monday, February 23, 2009

मौत का मजमा

टेलिविज़न रियलिटी शो बिग ब्रदर से चर्चित ब्रिटिश आर्टिस्ट जेड़ गुडी अब नहीं रहीं। गुडी ने अपनी मौत के लाइव टेलीकास्ट का इंतजाम किया था। ख़ुद से करीब ६ साल छोटे जैक ट्वीड से ब्याह रचाने वाली जेड़ सर्वाइकल कैंसर से पीड़ित थीं। 27 वर्षीय गुडी ने जब दुनिया से कूंच किया तो दुनिया ने देखा। मौत से कुछ दिन पहले उनकी शादी हुई तो भी सब लाइव था। वो हेलीकॉप्टर से पहुँची। दर्द की वजह से खड़े होने में असमर्थ दुल्हन ने पहले दवाओं से ख़ुद को सम्हाला, फिर मजबूर होकर बैंठ गई। उन्होंने ओके मैगजीन ग्रुप को प्रसारण के यह अधिकार 10 लाख पाउंड में बेचे। मरने के बाद यह पैसा उनके नए पति और पूर्व पति से जन्मे दो बच्चों को मिला होगा। वो बच्चों के लिए 30 करोड़ पाउंड छोड़ गयीं.... पर मौत का मजमा सजाने की जरूरत क्या थी? टीवी चैनल ने प्रसिद्धि पाने के लिए ये करार किया। जिस गुडी पर टाइम जैसी मैगजीन जमकर छाप रही हो, वो उसे कामयाबी का शोर्टकट लगी और कांट्रेक्ट कर लिया गया। मुझे तो नहीं लगता कि कैंसर जैसी बीमारी का इलाज और फिर मौत किसी के लिए मनोरंजक हो सकता है। फिल्मो और टीवी सीरिअल्स में किसी की मौत पर आंसू बहाने वाले कमज़ोर दिलों ने न जाने इसे कैसे सहन किया होगा? मौत जैसी त्रासदी का ऐसा बिकाऊ उदहारण। देश-दुनिया में मीडिया के बीच गलाकाट प्रतियोगिता का इससे त्रासद नतीजा भला क्या हो सकता है। वैसे, गुडी ख़ुद भी चर्चा बटोरने की आदी थीं भारतीय सिने तारिका शिल्पा शेट्टी पर उन्होंने नस्लभेदी टिप्पडी की होती तो बिग ब्रदर में शिल्पा जीत पाती और ख़ुद उन्हें इतनी प्रसिद्धि मिलती भारतीय रियलिटी शो बिग बॉस में भी वो झूठ बोलकर चर्चित हुईं ट्वीड के फ़ोन को अपने डॉक्टर का बताकर और इसी फ़ोन पर कैंसर की ख़बर मिलने की झूठी बातें उजागर हो चुकी हैं पता चला है कि कैंसर उन्हें पहले से थायह तमाशा दरअसल, अपनी महत्वाकान्शा और पैसा कमाने की अंधी चाहत का नतीजा भी है। गुडी के जाने के बाद मीडिया जगत को मंथन करना होगा कि लोकप्रियता बटोरने के लिए उसके स्टंट क्या ठीक हैं, अगर हैं तो कितने?


कलाजगत और मेरे बारे में कृपया पढिये न्यूज़ पेपर i-next में प्रकाशित आर्टिकल Painting is my life:-
http://www.inext.co.in/epaper/Default.aspx?pageno=4&editioncode=5&edate=2/27/2009

जय हो

इस बार हम भारतीयों ने इतिहास रचा है। हमारी फ़िल्म 'स्लमडाग मिलेनियर' ऑस्कर के दस वर्गों में नामांकित हुई और आठ ऑस्कर अपनी झोली में डाल लिए। मुंबई की झोपड़पट्टी में रहने वाले लड़के के करोड़पति बनने की कहानी पर बनी 'स्लमडाग' को सर्वश्रेष्ठ फिल्म और डैनी बोयल को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार मिला। संगीतकार एआर रहमान ने सर्वश्रेष्ठ मौलिक संगीत [ओरिजिनल स्कोर] और 'जय हो' गीत के लिए सर्वश्रेष्ठ मौलिक गीत का पुरस्कार जीता। बात यहीं ख़त्म नहीं होती, 'स्लमडाग' के अलावा भी समारोह में भारतीय उपस्थिति दर्ज कराई 'स्माइल पिंकी' ने। होंठ कटा होने के कारण सामाजिक बहिष्कार की शिकार उत्तरप्रदेश की नन्हीं सी लड़की पिंकी की कहानी के लिए मेगान मिलान ने सर्वश्रेष्ठ डाक्यूमेंटरी [लघु] का आस्कर पुरस्कार जीता। रहमान हम भारतीयों का नया गौरव हैं, अपनी दिलकश धुनों से देश-विदेश के संगीत रसिकों का मनोरंजन करने वाले रहमान उर्फ एएस दिलीप कुमार का जन्म चेन्नई में छह जनवरी 1966 को हुआ। उन्होंने अस्सी के दशक में इस्लाम कबूल करने के बाद नाम बदल कर अल्लाह रक्खा रहमान रख लिया। चार बार राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके रहमान को पद्मश्री से नवाजा जा चुका है। उन्हें फिल्मफेयर में 11 पुरस्कार मिल चुके हैं। कामयाबी बड़ी है, हालांकि इससे पहले भानु अथैया को रिचर्ड एटनबरो की 1983 में बनी फिल्म 'गांधी' में कास्ट्यूम डिजाइन और सत्यजीत रे [1992] को सिनेमा में आजीवन योगदान के लिए विशेष आस्कर से नवाजा गया था। .....अब तस्वीर के दूसरे रुख पर भी चर्चा कर ली जाए। miss universe और miss world के एक के बाद एक खिताब हमारी झोली में आए तो पहली बार हमारी आँख खुली कि हम लगभग एक अरब की आबादी वाले बडे देश हैं और हमारे बड़े बाज़ार पर मल्टी नेशनल कम्पनिओं की नज़र पहुँच चुकी है। हम आईटी में विश्व शक्ति बन जायें तो किसी को परवाह नहीं पर हमारी गरीबी खूब ध्यान बटाती है। ताज महल हो या सारनाथ, विदेशी टूरिस्टों के कैमरे का फोकस हमारे शहरों की गन्दगी, बदहाली और गरीब लोगों पर होता है। ऑस्कर में हमारी फ़िल्म की कामयाबी की ख़बर मिली, तब मैं सारनाथ में थी। आस्ट्रेलियन जैक मिलिनी से मैंने पूछ लिया, छूटते ही जवाब मिला, मुंबई की झोपड़पट्टी वाली फ़िल्म। वो जमाल मालिक को जानते थे, वही गरीब जमाल जो टेलीविजन शो से करोड़पति बन जाता है। फ़िल्म में धर्म के नाम पर हिंसा, भिक्षा और वैश्यावृत्ति सब-कुछ है। कहाँ नही है यह सब, पर हमारी कमियां विदेशों में बिकती हैं और गाँधी जैसी फ़िल्म महज एक ऑस्कर ही जीत पाती है। समझ में नहीं आता कि हम भारतीय जश्न मनाएं या गम।

Thursday, February 12, 2009

एक बड़ा झटका

ग्वालियर संगीत घराने के साथ ठगी की बड़ी घटना आँख खोल देने वाली हैप्रसिद्ध संगीतज्ञ स्वर्गीय पंडित रघुनाथ तलेगांकर के तबला वादक सुपुत्र केशव तलेगांकर चंडीगढ़ के भास्कर राव ऑडिटोरियम में अपनी प्रस्तुति पर अखबारों का कवरेज पड़ ही रहे थे कि उत्तर प्रदेश पुलिस के anti terrorist squad ने जैसे न केवल नींद से जगाया बल्कि सपने भी चकनाचूर कर दिए। खुलासा किया कि उनका पेइंग गेस्ट दीपांशु चक्रवर्ती ठगी की दुनिया का बड़ा खिलाड़ी है। केशव अवाक थे, पुलिस को ये सूचना देते वक्त वो रो ही पड़े कि दीपांशु ने उनसे भी 15-20 लाख रुपये उधार लिए हैं। बाद में पता कि एक दर्जन के आस-पास कलाकार उसका शिकार बने हैं। ख़ुद को united nations organisation का north india principal observer बताकर इस ठग ने रास्ट्रपति और प्रधान मंत्री की फर्जी प्रसस्ति बाँट दी। मेनका गाँधी तक को चूना लगा देने वाले इस ठग के पास से तमाम खाली प्रमाणपत्र पुलिस ने बरामद किए हैं। जितना बड़ा प्रमाणपत्र होता और जितना बड़ा उससे लाभ होने वाला होता, कीमत उतनी ही बड़ी वसूल की जाती। आगरा के बीडी जैन डिग्री कॉलेज में संगीत शिक्षक केशव तो पहले से ही स्थापित हैं पर न जाने कितने सड़क छाप लोगों को इसने रास्ट्रीय और अंतररास्ट्रीय स्तर का कलाकार बना दिया। ऐसे लोगों के नाम उसने पुलिस को बताये हैं। पुलिस की जांच न जाने कितने झूठे-सच्चे कलाकारों को स्तब्ध करेगी, लेकिन असली और ऐसे रास्ते से बचे रहे कलाकारों को सावधान हो जाने की जरूरत है। हम कलाकार यूहीं सब पर भरोसा करने और किसी भी रास्ते से पायी तथाकथित उपलब्धि पर रीझना छोड़ दें, तो ही बेहतर। मेरी नज़र में तो यही सच है, कि प्रतिभा किसी के दबाने से नहीं दबती और संघर्ष एक न एक दिन जरूर रंग लाता है। मकबूल फ़िदा हुसैन ने भी तो बरसो संघर्ष के बाद मुकाम पाया है।