Wednesday, November 18, 2009

कलाओं पर कैसा पहरा...

आर्ट और न्यूड... दोनों के रिश्ते पर तमाम बार सवाल उठते हैं और यदि फीमेल आर्टिस्ट न्यूड पेंट करें तो जैसे बवंडर ही मच जाता है. लेकिन कोई समझना नहीं चाहता की कैनवस पर कब, क्या और कैसे पेंट करना है, यह आर्टिस्टिक मूड डिसाइड करता है. कैनवस सामने आने पर कलाकार सोच-समझकर काम नहीं करता, वो तो होने लगता है. कला में दिल का प्रयोग होता है, यह दिल से निकलती है न कि दिमाग से. ज्यादा बौद्धिकता से संवेदनाएं मर जाती हैं.
हर आर्टिस्ट के लिए यह जरूरी है कि वह शरीर के हर अंग की बनावट को जाने. फ्रंट, बैक, साइड पोश्चर, बैठे, खड़े और लेटे की पोजीशन की डीप स्टडी किए बिना फिगरेटिव पेंटिंग की कल्पना मेरी समझ से परे है. एनाटॉमी स्टडी करने के लिए स्टूडेंट्स को किताबों का सहारा लेना पड़ता है क्योंकि इंडिया में न्यूड मॉडल उपलब्ध नहीं हो पाते. आर्टिस्ट का फंडामेंटल बेस ही यही है कि जैसे वह नेचर की प्रत्येक चीज को आब्जर्व करता है, वैसे ही नेचर के ही पार्ट मेल-फीमेल को बनाना सीखे. स्टूडेंट लाइफ में जब मैं न्यूड फिगर बनाती थी, तब अपने ही घर में मुझे लगता था कि सभी अच्छा फील नहीं कर रहे. हर सीखने वाले स्टूडेंट के साथ ऐसा ही होता होगा. न्यूड स्टडी करने के लिए किताबों का ही सहारा लेना पड़ता है चाहें वो मार्केट से ली जाएं या लाइब्रेरी से. स्टूडेंट को यह किताबें छिपाकर रखनी पड़ती हैं. डर ऐसा होता है कि कोई क्राइम कर रहा हो. मॉडल न्यूड हो या कपड़ों में, आर्टिस्ट के लिए महज एक आब्जेक्ट है. उसी तरह जैसे सामने कोई चीज रखी हो और उसका उसे चित्रांकन करना हो.
प्रसव के समय छटपटाती स्त्री को कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका डॉक्टर मेल है या फीमेल. इस अर्द्धनग्न अवस्था में उसे तमाम लोग देखते हैं. यह नए सृजन के लिए होता है इसलिये उसमें कहीं वल्गैरिटी नहीं मानी जाती. नवजात का स्वागत उल्लास और उमंग से किया जाता है लेकिन जब यही सृजन एक आर्टिस्ट करता है जिसमें उसकी कलाकृति का फिगर यदि न्यूड है तो विवाद शुरू हो जाता है. कला के कद्रदान तो एप्रीशियेट करते हैं, लेकिन सवाल उनमें से भी कुछ के होते हैं. अलग बात है कि पेंटिंग देखने वाले की मानसिकता कैसी है. कुछ लोग तो बुर्के में पूरी तरह से ढंकी महिला को भी जैसे किसी अलग किस्म की अपनी पारदर्शी आंखों से न्यूड देख लेते हैं. कलाकारों के बारे में एक आम टेंडेंसी है कि यदि मेल आर्टिस्ट कोई फीमेल न्यूड बना रहा है तो जरूर अपनी पत्नी या प्रेमिका को मॉडल के रूप में यूज कर रहा होगा और फीमेल आर्टिस्ट ऐसा न्यूड़ फिगर बना रही है तो वह अपना ही फिगर बना रही होगी. फिर उस फीमेल आर्टिस्ट को देखने का नजरिया ही बदल जाता है.
उन्हें इस तरह के कमेंट्स का सामना करना पड़ता है. कुछ तो दबे-छिपे पूछ भी लेते हैं कि क्या आपने खुद को पेंट किया है. जयशंकर प्रसाद की कामायनी पर पेंटिंग करने के दौरान जब मैंने श्रद्धा और मनु को कैनवस पर उतारा तो मुझे लगा कि कपड़ों के बिना दोनों पात्रों को ज्यादा बेहतर अभिव्यक्त किया जा सकता है. ग्वालियर में इस सीरीज की पेंटिंग्स की एक्जीबिशन पर मैंने खूब हंगामा झेला. स्त्री होकर भी एक स्त्री को मैंने इस रूप में क्यों बनाया, यह सवाल मुझे पूछा गया. मैं परेशान और दुखी थी. एक कट्टरपंथी संगठन के लोग इन्हें नष्ट करने की धमकी दे रहे थे. हजारों-लाखों आर्टिस्ट न्यूड पेंटिंग करते हैं, मैंने कुछ नया नहीं किया था. कला हो या साहित्य या कोई और फील्ड, महिलाओं का हाल एक ही है. वो कुछ अलग करेंगी तो निश्चित रूप से आलोचनाओं में घेरी जाएंगी. और शायद यही वजह है कि महिला कलाकार पुरुषों से आगे नहीं निकल पातीं. यहां मैं यह भी बताना जरूरी समझती हूं कि कला की शिक्षा लेने वालों में लड़कों से ज्यादा लड़कियां होती हैं. यह मुद्दा इतना आसान नहीं कि जल्दी सिमट जाए लेकिन विरोध की परवाह किए बगैर महिला कलाकार अपने रास्ते पर चलती रहीं तो सफलता मिलना तय है. साथ ही मुझे लगता है कि आर्ट एंड लिट्रेचर के प्रति समझ, संवेदना और खुले दिमाग की जरूरत भी है.