इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में इंग्लिश और माडर्न यूरोपियन भाषा विभाग की ये इमारत अपने एक प्रोफेसर की वजह से अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में है। बढ़ी दाढ़ी और सामान्य वेशभूषा वाले प्रोफेसर अरविन्द कृष्ण मेहरोत्रा ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक ऐसी कुर्सी के लिए तैयारी कर रहे हैं जो 300 साल पुरानी है और साहित्य जगत में बेहद प्रतिष्ठित। पिछले महीने वो यह जंग लड़ चुके हैं, बेशक हारे पर इज्ज़त से। ऑक्सफोर्ड में प्रोफेसर ऑफ़ पोएट्री की दौड़ उन्होंने नामचीन वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन की रिश्तेदार रूथ सोफिया पैडल से हारी। किसी आम भारतीय चुनाव की तरह पूरी सरगर्मी थी, सियासत के दाव-पेच भी थे। त्रिनिदाद के नोबेल अवार्ड विजेता डेरेक वालकोट को मैदान से हटना पड़ा क्योंकि 100 प्रोफेसरों को ईमेल भेजकर बताया गया कि वालकोट अपनी छात्रा से यौन दुर्व्यवहार में लिप्त रहे हैं। बात यहीं ख़त्म नहीं हुई, इस लड़ाई में लिप्तता के आरोप पर पहली महिला प्रोफेसर ऑफ़ पोएट्री सोफिया को भी त्यागपत्र देना पड़ा। ऑक्सफोर्ड के इस चुनाव में स्नातक वोट करते हैं, जीतने वाले को विश्व स्तर पर नाम पाने की गारंटी है। लड़ाई जैसी लड़ी गई, इलाहाबाद के उनके साथी प्रोफेसरों को हैरत हो रही है। मेहरोत्रा किस्मत के धनी हैं। इलाहाबाद में प्रोफेसर की पोस्ट के लिए लड़े और पायी। अपनी फील्ड में अपने दम पर नाम कमाया, जहाँ गए प्रतिष्ठा बढती गई। लाहौर में जन्मे अरविन्द को जो भी जानता है, उनके दमदार व्यक्तित्व की वजह से ही। मुख़र्जी रोड पर ज्योति अपार्टमेन्ट में उनका फ्लैट देखकर सादगी का एहसास होता है। पोस्ट खाली है और संभावना है कि वो फिर लडेंगे। ऑक्सफोर्ड में इंग्लिश के शिक्षक पीटर डी मैकडोनाल्ड ने अपनी वेबसाइट पर उन्हें किसी भी भाषा के श्रेष्ट कवियों में एक माना है। टेलीग्राफ में समीर रहीम ने विदेश की एक बड़ी लड़ाई में इस भारतीय योद्धा के दम पर आश्चर्य जताया है।
Saturday, May 30, 2009
एक जंग ये भी
इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में इंग्लिश और माडर्न यूरोपियन भाषा विभाग की ये इमारत अपने एक प्रोफेसर की वजह से अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में है। बढ़ी दाढ़ी और सामान्य वेशभूषा वाले प्रोफेसर अरविन्द कृष्ण मेहरोत्रा ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक ऐसी कुर्सी के लिए तैयारी कर रहे हैं जो 300 साल पुरानी है और साहित्य जगत में बेहद प्रतिष्ठित। पिछले महीने वो यह जंग लड़ चुके हैं, बेशक हारे पर इज्ज़त से। ऑक्सफोर्ड में प्रोफेसर ऑफ़ पोएट्री की दौड़ उन्होंने नामचीन वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन की रिश्तेदार रूथ सोफिया पैडल से हारी। किसी आम भारतीय चुनाव की तरह पूरी सरगर्मी थी, सियासत के दाव-पेच भी थे। त्रिनिदाद के नोबेल अवार्ड विजेता डेरेक वालकोट को मैदान से हटना पड़ा क्योंकि 100 प्रोफेसरों को ईमेल भेजकर बताया गया कि वालकोट अपनी छात्रा से यौन दुर्व्यवहार में लिप्त रहे हैं। बात यहीं ख़त्म नहीं हुई, इस लड़ाई में लिप्तता के आरोप पर पहली महिला प्रोफेसर ऑफ़ पोएट्री सोफिया को भी त्यागपत्र देना पड़ा। ऑक्सफोर्ड के इस चुनाव में स्नातक वोट करते हैं, जीतने वाले को विश्व स्तर पर नाम पाने की गारंटी है। लड़ाई जैसी लड़ी गई, इलाहाबाद के उनके साथी प्रोफेसरों को हैरत हो रही है। मेहरोत्रा किस्मत के धनी हैं। इलाहाबाद में प्रोफेसर की पोस्ट के लिए लड़े और पायी। अपनी फील्ड में अपने दम पर नाम कमाया, जहाँ गए प्रतिष्ठा बढती गई। लाहौर में जन्मे अरविन्द को जो भी जानता है, उनके दमदार व्यक्तित्व की वजह से ही। मुख़र्जी रोड पर ज्योति अपार्टमेन्ट में उनका फ्लैट देखकर सादगी का एहसास होता है। पोस्ट खाली है और संभावना है कि वो फिर लडेंगे। ऑक्सफोर्ड में इंग्लिश के शिक्षक पीटर डी मैकडोनाल्ड ने अपनी वेबसाइट पर उन्हें किसी भी भाषा के श्रेष्ट कवियों में एक माना है। टेलीग्राफ में समीर रहीम ने विदेश की एक बड़ी लड़ाई में इस भारतीय योद्धा के दम पर आश्चर्य जताया है।
Thursday, May 21, 2009
उम्मीद की किरण
चलो किस्मत से ही सही, देश की सबसे बड़ी पंचायत में महिलाओं की नुमाइंदगी बढ़ ही गई हालाँकि प्रमुख दलों ने उनकी जमकर अनदेखी की। कांग्रेस हो या भाजपा, किसी भी बड़े दल ने 10 फीसदी से ज्यादा महिलाओं को टिकट नहीं दिया था, जबकि ये दो दल तो उनके लिए 33 फीसदी आरक्षण की हिमायत करते हैं। कुल प्रत्याशिओं में सात प्रतिशत महिलाएं थीं। भाजपा ने 44, कांग्रेस ने 43, बसपा ने 28 और समाजवादी पार्टी ने 15 महिलाओं को चुनावी मैदान में उतारा था पर किस्मत भारी पड़ी। 59 महिलाएं पंद्रहवीं लोकसभा की सदस्य बनी हैं, जो अब तक का एक रिकॉर्ड है। इन महिला सांसदों में 17 वो हैं जिनकी उम्र 40 साल से कम है। सर्वाधिक 13 महिला सांसद उत्तर प्रदेश से हैं और सबसे ज्यादा 23 कांग्रेस की। देश की पहली लोकसभा में 4.4 परसेंट महिलाएं थीं जो अब बढ़कर 13.80 का आंकडा छू रही हैं। यह जरूर थोडी निराशा की बात है कि, जीत का यह मुकाम महिलाएं ज्यादातर पार्टी के नामों के सहारे ही पा सकी क्योंकि 200 ने निर्दलीय के रूप में उतरने की हिम्मत की थी पर जीत मिली सिर्फ़ नौ महिला उम्मीदवारों को। वैसे, यह चुनाव महिलाओं के भी नाम रहे। प्रियंका गाँधी ने अपने भाई राहुल और माँ सोनिया की सीट पर प्रचार का जिम्मा सम्हाल कर उन्हें देश भर में अपनी पार्टी का अभियान चलने के लिए मुक्त कर दिया, नतीजे चाहें जो भी रहें हो पर लाल कृष्ण आडवानी इसलिए गाँधी नगर की चिंता से मुक्त रहे कि बेटी प्रतिभा वहां कमान सम्हाले हुई थीं। महाराष्ट्र में सुप्रिया सुले ने अपने पिता शरद पवार का बोझ कम किया तो आन्ध्र प्रदेश में प्रजा राज्यम पार्टी के सुपरस्टार अध्यक्ष चिरंजीवी का काम बेटी सुष्मिता ने हलका किया। महाराष्ट्र में ही मरहूम सुनील दत्त की बेटी प्रिया अपनी पार्टी कांग्रेस का थोड़ा-बहुत काम अपने कन्धों पर लिए रहीं। अब नज़र नई सरकार पर है, यूपीए के बड़े घटक तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी ने अपने गठबंधन की पहली बैठक में 33 फीसदी महिला आरक्षण का मुद्दा उठाकर उम्मीद जगाई है। महिला आरक्षण की प्रबल विरोधी समाजवादी पार्टी, राजद और वाम दल चुनावी नतीजों से सकते में हैं। महिला सोनिया गाँधी की ही अगुवाई वाली कांग्रेस मजबूत हालत में है। सपा और राजद साथ हैं पर बेहद कमजोर। एक और विरोधी लोक जनशक्ति पार्टी के राम विलास पासवान बुरी मात के बाद अपने बिल में ख़ुद को कैद किए हुए हैं। मतलब, सब-कुछ अनुकूल है। शायद महिला आरक्षण के दिन अब आने वाले हैं।
Sunday, May 17, 2009
मतदाता की जय
लोकसभा चुनाव के नतीजे उम्मीद से उलट हैं, पर बेहद सुखदेय। कई डर इससे उड़नछू हो गए हैं। सियासत के लिए लाइलाज बीमारी बन रहे माफिया पस्त हुए हैं तो सत्ता तक पहुँचने के लिए बेशर्मी से अपने बयान बदल डालने वाले लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान जैसे नेता अपने बिलों में कैद होने को मजबूर। देश को मिल रही है एक स्थायी सरकार, कुछ अप्रत्याशित न हो तो पाँच साल तक चुनाव न होने की गारंटी भी। मायावती, जयललिता, शरद पवार जैसे छत्रप भी कुछ ख़ास कर पाने के काबिल नहीं बचे दिखते। पहली नज़र में चुनाव पर खर्च 10000 करोड़ बेकार नहीं हुआ लगता। यह कमाल हुआ कैसे? जाति, धर्म और अन्य नज़रों से चुनाव को देखने वाले मतदाता ने देश को इस बार अपनी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर रखा है। बिहार और उत्तर प्रदेश ने सियासी दलों को सबक दिया है कि वो सुधर जाएँ। नए सांसदों की लिस्ट में माफिया सूरजभान, पप्पू यादव यदि सुप्रीम कोर्ट की वजह से आउट हैं तो उनकी पत्नियाँ और मुख्तार अंसारी, अफ़साल अंसारी, अरुण शंकर शुक्ल अन्ना, अतीक अहमद, मित्रसेन यादव, डीपी यादव आदि को वोटरों ने ठुकरा दिया। साफ़ है कि वोटर अब जनतंत्र पर लाठी का राज बर्दाश्त करना नहीं चाहता। न ही उसे सत्ता की खातिर अपने वोटों की सौदेबाजी रास आई है। राजबब्बर, नफीसा अली, विनोद खन्ना, मनोज तिवारी का हार जाना भी सबक है कि ग्लेमर के बजाये अब काम चलेगा। मतदाता का जाग जाना एक उम्मीद पैदा करता है। वोटिंग परसेंटेज और बढ़ जाए तो ये जागृति क्रांति का सबब बनेगी, पूरे देश के चुनाव नतीजे यह उम्मीद पैदा करते हैं। और उम्मीद पर ही तो दुनिया कायम है।
यहाँ है इस पोस्ट का उल्लेख-
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