सिकुड़ती नदियों का यह एक यूज है. पुराने और स्टैब्लिस्ड आर्टिस्ट ही नहीं, अब नए लोग भी इस तरह मुड़ रहे हैं. और तो और... शहरों में वह नई जनरेशन जो नित नया करना चाहती है. वह भी आ रही है और खूब एंजॉय करती है. बात हो रही है सैंड आर्ट यानि रेत पर कला की. नदी किनारों की रेत पर कला का ट्रेंड बहुत पुराना है लेकिन चर्चित नए जमाने में खूब हुआ है. मौसम है इस कला का, आजकल कई आयोजन किए जा रहे हैं. सर्दियां और उसके बाद की गुनगुनी धूप का मौसम होता है इस आर्ट का और आम तौर पर होली तक जमकर चलता है.सुदर्शन पटनायक को कौन नहीं जानता, रेत पर आकर्षक कलाकृतियां बनाकर वह आज देश के सर्वाधिक फेमस कलाकारों में से एक बन गए. आलोचकों के मुताबिक बेशक, उन्होंने हर मौके को भुनाया. राष्ट्रीय पर्व हों या कोई भी मौका, वह कला रचते रहे और चर्चित हो गए. भारत में भी सैंड आर्ट पहले से ही प्रचलित थी लेकिन पहचान दिलाने वालों में वह सबसे आगे हैं. तमाम छोटे-बड़े कलाकार उनके रास्ते पर चल निकले और कला की यह विधा प्रोफिट में रही. कोलकाता, मुंबई या पटनायक की वजह से फेमस हुए समुद्र के एक अन्य शहर पुरी और इस तरह के अन्य शहरों की बात छोड़ भी दें तो नदियों वाले छोटे-बड़े शहरों में भी यह कला जमकर चल रही है. लोगों को अपना मुरीद बना रही है और खूब एंजॉयमेंट करा रही है. नई जनरेशऩ में इस आर्ट की इतनी पैंठ बन चुकी है कि उड़ीसा में सैंड आर्ट सिखाने के लिए इंस्टीट्यूट बना और देखते ही देखते स्टूडेंट्स की संख्या दो से 35 हो गई. इंस्टीट्यूट के पास संसाधनों की थोड़ी कमी है वरना यह संख्या बढ़कर न जाने कितनी हो गई होती. इंस्टीट्यूट हर साल दिसंबर में एनुअल एक्जीबिशन आर्गनाइज करता है तो देशभर के कला मुरीद और कलाकार जुटते हैं. इसी की देखा-देखी कई अन्य संस्थान भी खुले और स्टूडेंट्स की भीड़ वहां सैंड आर्ट सीख रही है. पुराने इंस्टीट्यूट्स भी अपने स्टूडेंट्स को यह विधा सिखा रहे हैं. नदियों के किनारे जब कोई ईवेंट आर्गनाइज होता है तो पार्टिसिपेंट्स की संख्या अच्छी-खासी होती है. पिछले दिनों हुए एक इवेंट में मैं भी गई थी. अजब नजारा था वहां, मंजे हुए हाथों के साथ ही वह लोग भी कला सृजन में जुटे थे जिनका कला से पहले कोई वास्ता नहीं रहा. गांव-देहात या शहरों के गली-मोहल्लों के यह लोग रेत से कुछ बनाते. अच्छा लगता तो ठीक वरना बिगाड़कर कुछ और बनाने लग जाते. कुछ के लिए यह मनोरंजन था तो कुछ के लिए कला निखारने का मौका. हाल यह था कि दर्शक भी हाथ आजमाने में लगे थे. गंगा का पूरा किनारा पिकनिक स्पॉट सा था. आलू-पूड़ी और चाट-पकौड़ी के साथ लोग गुनगुनी धूप में कला का आनंद ले रहे थे. पिछले साल भी हुआ था यह आयोजन, तब आठ-दस स्टूडेंट्स के एक ग्रुप ने नदी में बह रही बच्चे की डेडबॉडी को ही अपने कम्पोजीशन का एक पार्ट बना लिया और अवार्ड जीता. बरसों पहले लखनऊ में गोमती किनारे ऐसे एक आयोजन को खूब चर्चा मिली थी.
बनारस, इलाहाबाद, आगरा जैसे न जाने कितने शहर हैं जो इस कला से समय-समय पर रूबरू होते हैं. आम तौर पर चर्चा से दूर रहने वाले मुरादाबाद में दो साल पहले रामगंगा नदी के किनारे एक ईवेंट हुआ. गाजीपुर जैसे छोटे शहर ने भी अभी इस तरह के ईवेंट की मेजबानी की है. यह जानते हुए भी कि जब वह रेत से हटेंगे तो यह कुछ समय में यह कृतियां भी खत्म हो जाएंगी, लोग उत्साहित रहते हैं. विदेशों में बॉटल्स और जार में बनी रेत की कृतियां ज्यादा पसंद की जाती हैं. खास बात यह है कि समुद्र या नदी न होने के बावजूद कुछ देशों में इस तरह की रेत कृतियों का मार्केट है. रंग-बिरंगी रेत की इन कृतियों की आनलाइन ट्रेडिंग भी होती है. वहां सैंड एनीमेशन भी प्रचलित और चर्चित है. पेंटिंग फील्ड की होने के बावजूद मैं इस आर्ट की फैन हूं. मैं क्या, बचपन में रेत से घरौंदा बनाने वाले तमाम बच्चे जब बड़े होते हैं तो इस कला पर रीझ जाते हैं. आर्ट की तमाम अन्य स्टाइल्स की तुलना में खुद के यह सबसे ज्यादा करीब नजर आती है. सी बीच और नदियों के आसपास रेत पर धमाल मचाते बच्चे इस कला का वर्तमान और भविष्य हैं. नई पीढ़ी के लिए इस फील्ड में स्कोप है. कलाकारों के लिए बेहतर संभावनाएं और आम लोग तो इससे मनोरंजन करेंगे ही. कहा जाता है जो आम लोगों से जुड़े वही कला. स्कल्पचर का एक रूप सैंड आर्ट इसका बेहतर एक्जाम्पल है.
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