Wednesday, April 8, 2009

गाँधी जी के रास्ते

ईरोम चानू शर्मीला है उसका नाम, आंधी कहें तो उसे कम आंकेंगे हम। नौ साल से मणिपुर से दिल्ली आ रही हवाओं को इस लड़की ने तूफ़ान की सी शक्ल दे रखी है। वो कुछ बोलती नहीं, उसकी चुप्पी रंग दिखा रही है। सियासत गरम है, पर सियासतदां इस गर्माहट का फायदा नहीं उठाना चाहते कि कहीं यही गर्मी सत्ता मिलने के बाद उन्हें झुलसा न दे। शर्मीला ने एक कानून के ख़िलाफ़ जंग छेड़ रखी है। दर,असल Armed forces (Special powers) Act 1958 ने मणिपुर में लोगों का जीना हराम कर रखा है। इसमे सशस्त्र बलों को बिना कारण बताये किसी के भी ख़िलाफ़ काररवाई करने का अधिकार है। नौ साल पहले चानू ने अपने गाँव मालोम में असम रायफल्स का नंगा नाच देखा, बल के सिपहिओं ने एक युवक को आतंकवादी होने के शक मात्र पर मार डाला। चानू ने पूछा, तो यह कहकर टरका दिया गया कि शक था इसलिए मार डाला और उनसे सफाई तो सरकार भी नहीं मांग सकती। वो चुप नहीं बैठी, विवादित कानून न हटने तक अन्न का एक भी दाना ग्रहण न करने का एलान कर दिया। गांधी के इस देश में गाँधी के ही अहिंसा और सत्याग्रह के रास्ते पर चलने के इस फैसले ने खासी हलचल मचा दी। तीन दिन बाद आत्महत्या के प्रयास का आरोप लगाकर चानू को गिरफ्तार कर लिया गया। नहीं मानी तो न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया। जिंदा रखने के लिए नाक में नली डालकर विटामिन्स, मिनरल्स, प्रोटीन सप्लीमेंट्स आदि दिए जाने लगे गाँधी जयंती पर उसे रिहा किया गया तो वो दिल्ली आई और राजघाट पर पुष्प अर्पित करने के बाद भूख हड़ताल शुरू कर दी। यहाँ उसे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में भरती करा दिया गया। प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने समझाया पर कानून की पूरी तरह वापसी न होने तक उसने संघर्ष न छोड़ने का अपना इरादा बताकर उन्हें लौटा दिया। शर्मीला फिर मणिपुर में लाकर नज़रबंद कर दी गई। हाल ही में उसकी रिहाई हुई है, शायद उसके हाल में मौत की आहट से डरकर। शर्मीला कहती है कि सुनवाई तक का अधिकार न होना बड़ा अन्याय है। यह बंद होना चाहिए, हम लोकतंत्र में रहते हैं इसलिए भी ये तानाशाही बर्दाश्त नहीं। हड़ताल जारी है, सवाल अभी भी बुलंदी से खड़े है। हाँ, शर्मीला के शरीर में दम नहीं बची। वो अब बोल नहीं पाती। न जाने उसकी धड़कन कब बंद हो जायें। सरकारी कैद में मौत पर बदनामी न हो, दुनिया में मुद्दा न बन जाए, इसलिए उसे रिहा कर दिया। ईश्वर करे उसकी लडाई रंग लाये, और वो अपनी आंखों से देखे भी। गाँधी के देश में उसकी कोशिश अपराध नहीं है, यह तो हमारी सरकार को साबित करना ही होगा।

5 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

"शर्मीला कहती है कि सुनवाई तक का अधिकार न होना बड़ा अन्याय है।"

क्या ऐसी ही आजादी पर हमें गर्व होगा।
धिक्कार.....।

Kapil said...

इरोम के जज्‍बे को सलाम।

Kapil said...

इरोम के जज्‍़बे को सलाम।

Hari Joshi said...

बहुत अच्‍छी पोस्‍ट। सलाम इरोम को और आपको भी।

Babli said...

बहुत ही बढ़िया लिखा है आपने! मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है!