माइकल जैक्सन के निधन की ख़बर अचानक ऐसे आई कि सहसा विश्वास ही नहीं हुआ। कौन इतनी आसानी से मान लेता कि जिस जैक्सन ने बचपन से संघर्ष ही संघर्ष किया वो मौत के सामने यूँ ही हथियार डाल देगा। सनकी और क्रूर पिता की उम्मीदों के भारी-भरकम बोझ तले शुरू हुई इस कलाकार की कहानी तमाम कठिनाइयों और कामयाबिओं की मीठी-कड़वी चर्चाओं में आती रही। अचरज की बात है, जैक्सन थोड़ा परेशान होने के बाद उबर जाते और सफलता का कोई नया झंडा फेहरने लगता। जितनी कामयाबी मिली, उतनी ही बार परेशानी घेरने लगती। कहा तो यहाँ तक गया कि उन्हें मानसिक रोग है पर कैसा रोग जब, कलाकार जैक्सन अविचलित हुए स्टेज पर रंग जमाते रहें। रिकार्ड्स का ढेर लगता रहा। 1958 में जन्में जैक्सन तीन दशक तक स्टेज पर सक्रिय रहे। 11 साल की उम्र में द जैक्सन फाइव से प्रसिद्धि का जो सिलसिला चला, वो 1982 में एल्बम द थ्रिलर की 4.1 करोड़ प्रतियाँ बिकने के साथ ही अपने चरम पर पहुँच गया। इस लम्बे कैरियर में उन्होंने 13 ग्रैमी अवार्ड्स जीते। जैक्सन ने अपने 50 साल के इस जीवन में तमाम परीक्षाएं दीं। 1993 में उन पर बाल यौन शोषण का सबसे बड़ा और कष्टकारी आरोप लगा, इसके बाद उन्होंने तमाम प्रसंशक खो दिए हालांकि 2005 में इन आरोपों से बरी भी हो गए। अलग लाइफ स्टाइल ने जहाँ उन्हें भरपूर चर्चाएँ दिलाईं वहीँ इस्लाम कुबूल करने के बाद भी थोड़ा नकारात्मक प्रचार हुआ। उनकी घरेलू कहानियाँ भी विवादों से भरी रहीं। 1994 में उन्होंने पहली बार विवाह किया, लेकिन यह सिर्फ़ दो साल चला। पाँच साल बाद फिर शादी हुई, और यह सम्बन्ध भी मात्र दो ही साल चल पाया। इतना-सब कुछ झेलने के बाद जैक्सन 2001 में सबसे ज्यादा परेशान हो गए थे। यह दौर इस साल सात जुलाई को ख़त्म हो जाता, जब वो फिर स्टेज पर लौटने का मन बना रहे थे, लेकिन इससे पहले ही दुनिया के स्टेज से उनकी विदाई हो गई। यहाँ भी जीवट ही दिखता है उनका, रिपोर्ट्स बता रहीं हैं कि वो फिर खड़ा हो रहे थे। इंजेक्शन से हुई मौत की अटकलें बता रही हैं, कि इस कलाकार ने हार नहीं मानी बल्कि असमय विदा हो जाना पड़ा।Saturday, June 27, 2009
Thursday, June 25, 2009
बचानी होगी डिग्रियों की चमक
आख़िर ऐसा हो क्यों रहा है? हम इंडियन अपने एजूकेशन सिस्टम पर इतना इतरा रहे हैं, नयी यूनिवर्सिटीस खोल रहे हैं. लगातार दावा कर रहे हैं कि हम विदेशी यूनिवर्सिटीस से हाथ मिलाकर हाइ लेवेल और मॉडर्न एजुकेशन यहाँ भी देंगे पर इंडियन स्टूडेंट्स क्यों अन्य देशों की ओर दौड़ लगाते हैं? ऑस्ट्रेलिया और फिर कनाडा में अपने स्टूडेंट्स पर लगातार हमलों ने हमें आँख खोलने पर मजबूर कर दिया है. हम इंडियन विदेशों में अपने बच्चो को एजुकेशन दिलाने में हर साल 13 बिलियन डॉलर्स खर्च करते हैं जो बेहतरीन इनफ्रास्ट्रक्चर वाले 100 कॉलेज खड़ा करने में ज़्यादा पड़ेंगे. अकेले यूपी की बात करें तो इन कॉलेजस में 10000 स्टूडेंट्स खप सकते हैं. यहाँ बड़ी संख्या में खुले सेल्फ़ फाइनॅन्स कॉलेजस में एवरेज 100 स्टूडेंट्स की पर्मिशन है. इन 100 कॉलेजस में कितना स्टाफ नौकरी पाएगा यह तो एक और भी प्लस पॉइंट है. हर साल करीब 450000 स्टूडेंट्स विदेश जाते हैं. यानी जितना पैसा इन स्टूडेंट्स को विदेश जाने से रोकने के लिए चाहिए वो कोई बहुत ज़्यादा नही. सरकार हाइयर एजुकेशन सिस्टम पर बहुत बड़ी राशि खर्च करती है और एजुकेशन को इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन में फंडामेंटल राइट माना गया है।अब सवाल उठता है कि क्यों लगती है ये रेस?
जब हम खूब सारे नये इनस्टिट्यूट्स खोल रहे हैं, रोज नयी प्राइवेट यूनिवर्सिटीस सामने आ रही हैं, नये कोर्स शुरू हो रहे हैं, फिर भी यह क्रम रुकने के बजाए तेज़ हो रहा है, क्यों? ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, यूएस, यूके, सिंगापुर में ये स्टूडेंट्स 1500-2000 डॉलर्स हर महीने खर्च करते है, जबकि आईआईटी जैसे बड़े संस्थानों में 120 डॉलर्स के बराबर रुपयों में काम चल जाता है. फिर भी ये हाल? इसकी कई वजह हैं। हम अपने स्टूडेंट्स और उनके पेरेंट्स को गाइड करने के बजाए कॉनफ्यूज होने से नही रोक पा रहे. मैने खुद कॅल्क्युलेशन किया तो पाया कि एक दिन में अलग-अलग प्रचार माध्यमों से स्टूडेंट्स के पास दर्जनो कॉलेजस का नाम पहुँच रहा है. बड़े इनस्टिट्यूट्स में सीटें ज़्यादा हैं नहीं, कड़ी स्पर्धा है। फिर एजुकेशन फील्ड में धोखाधड़ी भी भरपूर है. एक एमबीए स्टूडेंट आया था मेरे पास. उसने एक लाख रुपये डोनेशन देकर लखनऊ में एडमीशन लिया, साल भर पढ़ाई भी की पर एग्ज़ाम का टाइम आया तो उसकी जगह 50 हज़ार ज़्यादा देने वाले को बैठा दिया गया. एक और मामला मुझे याद है, एक टीचर ने अपने पड़ोस में रहने वाले लड़के का एडमीशन कराया. पूरे साल पढ़ाई करने के बाद उसे एक अन्य कॉलेज में कुछ लड़कों के साथ एग्ज़ाम दिलाया गया. जॉब मिलने पर मार्क्सशीट का वेरिफिकेशन हुआ तो वो फर्जी मिली. ऐसे तमाम फ्रॉड अख़बारों की हेडलाइन्स बनते रहते हैं. एजुकेशन के नाम पर तमाम लोग धंधाखोरी कर रहे हैं जिससे स्टूडेंट्स में डर पैदा हो रहा है.
कोई शक नहीं कि विदेशों में ज़्यादा बेहतर एजुकेशन सिस्टम है. वहाँ अपने बच्चे को पढ़ाना स्टेटस सिंबल तो है ही. एक और प्लस पॉइंट यह है कि एजुकेशन लोन के ज़रिए ये बहुत मुश्किल भी नहीं. वहाँ पार्टटाइम जॉब के ज़रिए इस लोन को चुकाना बहुत आसान है. विदेशों में पैसा है, और अगर इंडिया आना पड़ा तो विदेशी डिग्री के दम पर बढ़िया नौकरी की गारंटी भी है. ऐसे में हम ना तो उन्हें जाने से रोक सकते हैं और ना ही रुकेंगे ही. फिर होना क्या चाहिए? फौरिन जरूरत तो एजूकेशन सिस्टम की कमियां सुधारने कि है. हमारी सरकार के कड़े कदमों की है. उसे इन देशों को अपने स्टूडेंट्स की सेफ्टी के लिए मजबूर करना होगा. जब तक हम अपने यहाँ ही ऐसा सिस्टम डेवलप नहीं कर लेते, अपने स्टूडेंट्स का करियर सेफ और ब्राइट कर पाने में सक्षम नहीं हो जाते तब तक, आँसू बहाने के बजाए समझदारी से काम लेना होगा. कोसने से तो बेहतर है हालात का सामनाकरना। उम्मीद है कि यही होगा और उम्मीद पर ही तो दुनिया कायम है.
मेरा आर्टिकल inext newspaper के सभी संस्करणों में दिनांक 25 june 2009 के अंक में भी पढ़ें-
http://inext.co.in/epaper/Default.aspx?edate=6/25/2009&editioncode=1&pageno=16
जब हम खूब सारे नये इनस्टिट्यूट्स खोल रहे हैं, रोज नयी प्राइवेट यूनिवर्सिटीस सामने आ रही हैं, नये कोर्स शुरू हो रहे हैं, फिर भी यह क्रम रुकने के बजाए तेज़ हो रहा है, क्यों? ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, यूएस, यूके, सिंगापुर में ये स्टूडेंट्स 1500-2000 डॉलर्स हर महीने खर्च करते है, जबकि आईआईटी जैसे बड़े संस्थानों में 120 डॉलर्स के बराबर रुपयों में काम चल जाता है. फिर भी ये हाल? इसकी कई वजह हैं। हम अपने स्टूडेंट्स और उनके पेरेंट्स को गाइड करने के बजाए कॉनफ्यूज होने से नही रोक पा रहे. मैने खुद कॅल्क्युलेशन किया तो पाया कि एक दिन में अलग-अलग प्रचार माध्यमों से स्टूडेंट्स के पास दर्जनो कॉलेजस का नाम पहुँच रहा है. बड़े इनस्टिट्यूट्स में सीटें ज़्यादा हैं नहीं, कड़ी स्पर्धा है। फिर एजुकेशन फील्ड में धोखाधड़ी भी भरपूर है. एक एमबीए स्टूडेंट आया था मेरे पास. उसने एक लाख रुपये डोनेशन देकर लखनऊ में एडमीशन लिया, साल भर पढ़ाई भी की पर एग्ज़ाम का टाइम आया तो उसकी जगह 50 हज़ार ज़्यादा देने वाले को बैठा दिया गया. एक और मामला मुझे याद है, एक टीचर ने अपने पड़ोस में रहने वाले लड़के का एडमीशन कराया. पूरे साल पढ़ाई करने के बाद उसे एक अन्य कॉलेज में कुछ लड़कों के साथ एग्ज़ाम दिलाया गया. जॉब मिलने पर मार्क्सशीट का वेरिफिकेशन हुआ तो वो फर्जी मिली. ऐसे तमाम फ्रॉड अख़बारों की हेडलाइन्स बनते रहते हैं. एजुकेशन के नाम पर तमाम लोग धंधाखोरी कर रहे हैं जिससे स्टूडेंट्स में डर पैदा हो रहा है.
कोई शक नहीं कि विदेशों में ज़्यादा बेहतर एजुकेशन सिस्टम है. वहाँ अपने बच्चे को पढ़ाना स्टेटस सिंबल तो है ही. एक और प्लस पॉइंट यह है कि एजुकेशन लोन के ज़रिए ये बहुत मुश्किल भी नहीं. वहाँ पार्टटाइम जॉब के ज़रिए इस लोन को चुकाना बहुत आसान है. विदेशों में पैसा है, और अगर इंडिया आना पड़ा तो विदेशी डिग्री के दम पर बढ़िया नौकरी की गारंटी भी है. ऐसे में हम ना तो उन्हें जाने से रोक सकते हैं और ना ही रुकेंगे ही. फिर होना क्या चाहिए? फौरिन जरूरत तो एजूकेशन सिस्टम की कमियां सुधारने कि है. हमारी सरकार के कड़े कदमों की है. उसे इन देशों को अपने स्टूडेंट्स की सेफ्टी के लिए मजबूर करना होगा. जब तक हम अपने यहाँ ही ऐसा सिस्टम डेवलप नहीं कर लेते, अपने स्टूडेंट्स का करियर सेफ और ब्राइट कर पाने में सक्षम नहीं हो जाते तब तक, आँसू बहाने के बजाए समझदारी से काम लेना होगा. कोसने से तो बेहतर है हालात का सामनाकरना। उम्मीद है कि यही होगा और उम्मीद पर ही तो दुनिया कायम है.
मेरा आर्टिकल inext newspaper के सभी संस्करणों में दिनांक 25 june 2009 के अंक में भी पढ़ें-
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