Saturday, October 31, 2009

कामायनी और मैं

कामायनी मुझे अपनी सबसे प्रिय पेंटिंग सीरीज में से एक है। मुझे नियमित रूप से पुस्तकें पढ़ने का शौक है, खासकर बड़ी शख्सियतों की पुस्तकें। वाकया आगरा का है। वहां आगरा कालेज में अध्यापन के दौरान एक शिक्षक साथी के साथ जयशंकर प्रसाद की पुस्तकों पर चर्चा चल रही थी। कामायनी पर बात आते ही मुझे लगा, जैसे मेरे भीतर का कलाकार कुछ करना चाहता है। प्रलय के दौरान मनु और श्रद्धा का प्रेम मुझे प्रेरक लगा। कल्पना की उस समय की। मैं जैसे खो सी गयी। मैंने तत्काल पेपर पर स्केच बनाना शुरू किया और देखते ही देखते मनु का चित्र उतर आया। बेशक, अन्य कल्पनाओं की तरह यह कल्पना भी मुश्किल नहीं थी। पहले चित्र का स्केच मनमुताबिक आना शुरू हुआ तो उत्साह बढ़ा। हालांकि विषय की संवेदना और भाव-भंगिमा को चित्र में उतारने में बाद में खासी मेहनत करनी पड़ी। प्रलय के कारण भावशून्य हुए मनु के रूप में मुझे मन दिखाना था और श्रद्धा के रूप में दिल। रहस्य, स्वप्न, आशाएं, कर्म, काम, वासना, आनंद, लज्जा, ईर्ष्या और चिंता के भावों का चित्रण करना सचमुच चुनौतीपूर्ण है। सीरीज़ में विशेषता इसकी टेक्चरल क्वालिटी और आंखों पर ज़्यादा काम किये बिना ही उनके भावों को दर्शाने की कोशिश है। चित्रांकन के दौरान मैं कामायनी पढ़ती रही। कुछ पेज तो कई-कई बार पढ़े। मैंने एक साल तक लगातार इस सीरीज पर काम किया। हालांकि पूरी तरह संतुष्टि नहीं हुई। मन को समझाती रही कि संतुष्ट न होना तो कलाकार का गुण ही है, संतुष्ट हुए तो लगे किनारे। मेरी इस सीरीज ने चर्चा भी पायी। ग्वालियर में एक्जीबीशन के दौरान एक हिंदू संगठन ने विरोध किया। पहले दिन नारेबाज़ी हुई। मैंने समझाया कि चित्रों में मौलिकता दिखाना हर चित्रकार का अपना अधिकार है। वो जानता है कि किस समय को किस तरह से व्यक्त किया जाना चाहिए। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में अपनी प्रदर्शनी में मैंने यह पेंटिंग्स भी लगायीं, सौभाग्य से सराहना भी मिली।
यह पंक्तियां वेबसाइट मोहल्लालाइवडॉटकॉम से ली गई हैं। सीनियर जनर्लिस्ट अविनाश दास की साइट अपने अनूठेपन और संपूर्णता के लिए चर्चित है। इसे देखने के लिए क्लिक करें। कमेंट्स भी जरूर पढ़ें और लिखे भी-
http://mohallalive.com/2009/10/31/painting-of-uttama-dixit-on-jaishankar-prasad-kamayani/
मोहल्लालाइव पर खूब चर्चाएं चल रही हैं। लवगुरु प्रोफेसर मटुकनाथ चौधरी और जूली ने भी इन चर्चाओं में भाग लिया है। अमर उजाला ने अपने वाराणसी संस्करण में 12 नवम्बर 2009 के अंक में इसका उल्लेख किया है, जिसका लिंक निम्न है-
http://2.bp.blogspot.com/_NxhMpnpS6Ss/Svu-1Iv8wsI/AAAAAAAAGI0/-GJ_m5AJmXM/s1600-h/kala-jagat-mohalla-live-blog-print.jpg

3 comments:

महफूज़ अली said...

bahut achchi lagi aapki yeh post.... aap painting bhi kartin hain ......... yeh jaan ke aur achcha laga....

Alok Nandan said...

सृजन प्रक्रिया को बेहतर तरीके से बताया आपने, मैं अक्सर सृजन के बजाय सृजन प्रक्रिया को समझने की कोशिश करता हूं....थैंक्स फोर इट

Uttama said...

मोहल्लालाइव पर मेरी कलाकृतियों पर बहस शुरू हुई है। बेशक, मैं इससे खुश हूं। मुझे परवाह नहीं कि कौन क्या कहता है लेकिन यदि तीर निशाने पर लगने लायक हो तो जरूर लगता है। स्वस्थ आलोचनाएं मुझे रास्ता दिखाती हैं। जहां महज इसलिये विरोध है कि एक पौराणिक पात्र का मैंने यूं चित्रण किया है तो मेरे एक मित्र ने यह कहकर मेरा उत्साहवर्धन किया है... आलोचना जितनों ने की है, उनसे कम नहीं हैं तारीफ़ करने वाले. मैं मंत्रमुग्ध रह गया। एक साहब लिखते हैं--चेहरों के ज़रिए भी उत्तमा जी व्याख्या कर सकती थीं. उन्हें कौन बताए कि देह की ज़रूरतों और उसकी बुनावट चेहरे नहीं बता सकते। वो आभास भर दे सकते हैं। ये नैतिकता के पहरेदार रात के अंधेरों में किसी पागल कुत्ते से भी ज्यादा ख़तरनाक हो जाते हैं। इन्हें ना तो अपनी ज़रूरतों, इच्छाओं और वासना की आत्मस्वीकारोक्ति करने की हिम्मत है, ना ही इच्छाबल...। ऐसों से ना प्रेम करना ठीक है, ना घृणा। दरअसल, ये कायर लोग हैं...। इनसे डरने का कोई मतलब नहीं।