Monday, December 14, 2009
नौगढ़ः एक बड़ी उम्मीद
नौगढ़ को शायद कम ही लोग जानते होंगे। बिहार की सीमा से जुड़े उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले का यह इलाका ऐसा है कि एक ही बार में मन मोह ले। अनुपम नजारे हैं यहां। पहाड़ हैं और हरे-भरे वन भी। बुरी बात है यहां की गरीबी। मुझे पिछले दो साल में यहां तीन बार जाने का मौका मिला। हर बार ज्यादा मोहित हुई यहां के प्राकृतिक सौंदर्य पर। पहली बार जब गई तो अनजान थी। अगली दो बार तो बिना कार्यक्रम बनाए ही पहुंच गई। इस बार मौका अलग था, जिले के प्रशासन ने अनूठी पहल की थी। गरीबी और बेरोजगारी से जूझ रहे इस इलाके को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए उसने नौगढ़ महोत्सव का आयोजन किया। पूरे संसाधन झोंक दिए गए। सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त थे। मुझे एकल प्रदर्शनी आयोजित करने के लिए आमंत्रित किया गया। यह मेरी नजर में एक अनोखी सी बात थी। जहां कला का माहौल न हो, वहां प्रदर्शनी का क्या औचित्य? लेकिन प्रशासन चाहता था कि यहां माहौल बने। महोत्सव को हर तरह से सफल बनाने की इच्छा थी उसकी। बेशक, कला भी जीवन के रंग उभारती है। मैं युवक और युवतियों का उत्साह देखकर आश्चर्यचकित थी। तीन दिन की इस प्रदर्शनी के दौरान तमाम युवक-युवतियों ने सवाल किए। इंटर कालेजों की लड़कियों ने ठान लिया कि वह कला को अपना विषय बनाएंगी। उन्हें बेसिक नालेज मिलने के बाद लगने लगा था कि कला उन्हें उभार सकती है। प्रशासन कामयाब था, देशी-विदेशी पर्यटकों की आवाजाही हुई थी वहां। मैं उत्साहित थी। गरीबी और बेरोजगारी से द्रवित हुआ मेरा मन अब आल्हादित था। आईजी गुरुदर्शन सिंह, डीएम रिक्जियान सैम्फिल और एसपी लक्ष्मी नारायण ने भी मेरी पेंटिंग्स के विषय को समझा और लोगों को समझाया। कई बार तो अफसर ही गाइड बन गए। महोत्सव में लगे स्टाल्स पर जुटी भीड़ को भी यह अफसर समझा रहे थे। महोत्सव सफल रहा। उम्मीद बंधी कि क्षेत्र मुख्यधारा से जुड़ सकेगा। मैं भी खुश हूं कि इस पहल में मेरी भूमिका है।
Thursday, December 3, 2009
बेजुबानों पर कहर का भी प्रचार
कई दिन से उद्वेलित थी, परेशान थी। बकरीद के अगले दिन सुबह उठी तो समाचार पत्र में ऊंट की बलि की खबर देख ली। उद्वेलित इसलिये थी कि कुछ लोग कैसे सार्वजनिक रूप से एक जीव की हत्या कर सकते हैं? एक आदमी को मार डालना जेल भिजवा सकता है, हत्यारे को फांसी हो सकती है तो एक बेजुबान को मार डालने की इस देश में कोई सजा नहीं? उन्मादी भीड़ लोगों को मार दे तो दंगाई कहलाती है लेकिन यदि एक जानवर को मार दे तो कुछ नहीं, कोई सजा नहीं? परेशानी यह थी कि कैसे कोई इस घटना का महिमामंडन कर सकता था? एक ही दिन में तीन स्थानों पर ऊंटों की बलि कैसे इतनी जोर-शोर से उछाली जा सकती है, आखिर हम जैसे लोग भी तो हैं दुनिया में। मैं मानती हूं कि उन्हें कुर्बानी का हक है लेकिन खुलेआम और उसका इतना प्रचार???अभी एक दिन मैं इंटरनेट पर एक सर्वे पढ़ रही थी जिसमें उल्लेख था कि इंडोनेशिया में मीट की खपत कम हो गई है और बड़ी संख्या में लोग शाकाहार को पसंद करने लगे हैं। दक्षिण कोरिया में कुत्तों की हत्या रोकने के लिए दुनियाभर में एक अभियान चल रहा है। एक आनलाइन पिटीशन पर ही तीन लाख से ज्यादा लोग साइन कर चुके हैं। दक्षिण कोरिया में बीस लाख के आसपास कुत्ते बर्बरतापूर्वक मार दिए जाते हैं। हम वहीं के वहीं हैं। बचपन में मैंने एक सुअर तो मरते देख लिया था तो कई दिन खाना नहीं खाया बल्कि लगातार रोने पर मम्मी की कई बार डांट जरूर पड़ी थी। दीपावली के दिन छत पर दीप सजा रही थी कि तभी कुछ लोगों की आवाजें सुनीं। एक सुअर भी चीख रहा था। सुअर भाग रहा था। लोग पांच तरफ से उसे घेरे हुए थे। सुअर चिल्ला रहा था, इधर मैं भी चीख रही थी। लगा यह कैसे संभव है, सार्वजनिक रूप से हत्या? कोई कैसे किसी को इस तरह मार सकता है? क्या मजा आता है उन्हें? यहां महज पेट के लिए यह कुकर्म हो रहा था।
करीब तीन साल की थी तब नानी के गांव गई। एक पुजारी ने कुछ लोगों के साथ तीतर को मार गिराया। मैं तीन दिन तक बुखार में रही। मैं उस पुजारी को बाबा कहती थी, घटना के बाद इतनी डर गई कि बड़ी होने तक गांव गई ही नहीं। गई तब पुजारी मर चुका था, नहीं तो खूब खरी-खोटी सुनाती। वह उस धर्म से जुड़े़ थे, जो इसका प्रबल विरोधी है। उन्हें यह कतई हक नहीं था। दूसरा, उन्होंने मेरे सामने क्यों मारा? मुझसे हट जाने के लिए कह देते। छोटी थी, आसानी से बहल जाती शायद। सच कहूं तो उन्हें खरी-खोटी सुनाने ही गई थी वहां। एक ऊंट की पैर की चोट को मैंने काफी देर तक सहलाया था। तमाम कुत्तों को खाना खिलाया और एक को देर रात नाली से निकालकर बचाया भी था। यह गांधीजी के अहिंसा के सिद्धांत पर चलने वाला देश है। नेमिनाथ भी जैन धर्म के भगवान इसलिये हो गए कि उन्होंने जीव हत्या के विरुद्ध अपना सब-कुछ त्याग दिया। उनका विवाह था। वह दूल्हे बने थे कि तभी पिंजरे में बंद जानवरों को देख लिया जिन्हें रात्रि भोज के लिए काटा जाना था। सोचने लगे कि मेरी शादी के लिए इतनी बलि। दुल्हन सजी-धजी बैठी रही और वो वैरागी हो गए। एक बेजुबान की हत्या होती है और आसपास के लोग इतने प्रसन्न होते हैं। नजारा ऐसा होता है जैसे बुराई के प्रतीक रावण को अच्छाई के हिमायती घेर रहे हैं। घोर निंदनीय है यह। तमाम लोग मुझसे इत्तेफाक नहीं रखते होंगे तो न रखें। मैं संवेदनशील हूं और तमाम लोग मुझ जैसे हैं। हमें यह अच्छा नहीं लगता। हम दुखी होते हैं, घंटों रोते हैं। एक बेजुबान दम तोड़ रहा होता है। यह कहां की मानवता है? कोई कुछ नहीं कर सकता तो इतना ही संभव हो जाए कि यह बलियां सार्वजनिक रूप से न हों औऱ यदि यह भी न हो पाए तो हम प्रचारित ही नहीं करें। किसी के धर्म का मामला है तो उन्हें ही करने दें क्योंकि उनका धर्म बेशक बलि की हिमायत करता है लेकिन प्रचार तो हम अपने प्रचार के लिए कर रहे हैं।
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