Thursday, December 3, 2009

बेजुबानों पर कहर का भी प्रचार

दिन से उद्वेलित थी, परेशान थी। बकरीद के अगले दिन सुबह उठी तो समाचार पत्र में ऊंट की बलि की खबर देख ली। उद्वेलित इसलिये थी कि कुछ लोग कैसे सार्वजनिक रूप से एक जीव की हत्या कर सकते हैं? एक आदमी को मार डालना जेल भिजवा सकता है, हत्यारे को फांसी हो सकती है तो एक बेजुबान को मार डालने की इस देश में कोई सजा नहीं? उन्मादी भीड़ लोगों को मार दे तो दंगाई कहलाती है लेकिन यदि एक जानवर को मार दे तो कुछ नहीं, कोई सजा नहीं? परेशानी यह थी कि कैसे कोई इस घटना का महिमामंडन कर सकता था? एक ही दिन में तीन स्थानों पर ऊंटों की बलि कैसे इतनी जोर-शोर से उछाली जा सकती है, आखिर हम जैसे लोग भी तो हैं दुनिया में। मैं मानती हूं कि उन्हें कुर्बानी का हक है लेकिन खुलेआम और उसका इतना प्रचार???
अभी एक दिन मैं इंटरनेट पर एक सर्वे पढ़ रही थी जिसमें उल्लेख था कि इंडोनेशिया में मीट की खपत कम हो गई है और बड़ी संख्या में लोग शाकाहार को पसंद करने लगे हैं। दक्षिण कोरिया में कुत्तों की हत्या रोकने के लिए दुनियाभर में एक अभियान चल रहा है। एक आनलाइन पिटीशन पर ही तीन लाख से ज्यादा लोग साइन कर चुके हैं। दक्षिण कोरिया में बीस लाख के आसपास कुत्ते बर्बरतापूर्वक मार दिए जाते हैं। हम वहीं के वहीं हैं। बचपन में मैंने एक सुअर तो मरते देख लिया था तो कई दिन खाना नहीं खाया बल्कि लगातार रोने पर मम्मी की कई बार डांट जरूर पड़ी थी। दीपावली के दिन छत पर दीप सजा रही थी कि तभी कुछ लोगों की आवाजें सुनीं। एक सुअर भी चीख रहा था। सुअर भाग रहा था। लोग पांच तरफ से उसे घेरे हुए थे। सुअर चिल्ला रहा था, इधर मैं भी चीख रही थी। लगा यह कैसे संभव है, सार्वजनिक रूप से हत्या? कोई कैसे किसी को इस तरह मार सकता है? क्या मजा आता है उन्हें? यहां महज पेट के लिए यह कुकर्म हो रहा था।
करीब तीन साल की थी तब नानी के गांव गई। एक पुजारी ने कुछ लोगों के साथ तीतर को मार गिराया। मैं तीन दिन तक बुखार में रही। मैं उस पुजारी को बाबा कहती थी, घटना के बाद इतनी डर गई कि बड़ी होने तक गांव गई ही नहीं। गई तब पुजारी मर चुका था, नहीं तो खूब खरी-खोटी सुनाती। वह उस धर्म से जुड़े़ थे, जो इसका प्रबल विरोधी है। उन्हें यह कतई हक नहीं था। दूसरा, उन्होंने मेरे सामने क्यों मारा? मुझसे हट जाने के लिए कह देते। छोटी थी, आसानी से बहल जाती शायद। सच कहूं तो उन्हें खरी-खोटी सुनाने ही गई थी वहां। एक ऊंट की पैर की चोट को मैंने काफी देर तक सहलाया था। तमाम कुत्तों को खाना खिलाया और एक को देर रात नाली से निकालकर बचाया भी था। यह गांधीजी के अहिंसा के सिद्धांत पर चलने वाला देश है। नेमिनाथ भी जैन धर्म के भगवान इसलिये हो गए कि उन्होंने जीव हत्या के विरुद्ध अपना सब-कुछ त्याग दिया। उनका विवाह था। वह दूल्हे बने थे कि तभी पिंजरे में बंद जानवरों को देख लिया जिन्हें रात्रि भोज के लिए काटा जाना था। सोचने लगे कि मेरी शादी के लिए इतनी बलि। दुल्हन सजी-धजी बैठी रही और वो वैरागी हो गए। एक बेजुबान की हत्या होती है और आसपास के लोग इतने प्रसन्न होते हैं। नजारा ऐसा होता है जैसे बुराई के प्रतीक रावण को अच्छाई के हिमायती घेर रहे हैं। घोर निंदनीय है यह। तमाम लोग मुझसे इत्तेफाक नहीं रखते होंगे तो रखें। मैं संवेदनशील हूं और तमाम लोग मुझ जैसे हैं। हमें यह अच्छा नहीं लगता। हम दुखी होते हैं, घंटों रोते हैं। एक बेजुबान दम तोड़ रहा होता है। यह कहां की मानवता है? कोई कुछ नहीं कर सकता तो इतना ही संभव हो जाए कि यह बलियां सार्वजनिक रूप से न हों औऱ यदि यह भी न हो पाए तो हम प्रचारित ही नहीं करें। किसी के धर्म का मामला है तो उन्हें ही करने दें क्योंकि उनका धर्म बेशक बलि की हिमायत करता है लेकिन प्रचार तो हम अपने प्रचार के लिए कर रहे हैं।

25 comments:

Nalin Mehra said...

read ur article uttama, it is really sad that people act so cruelly with animals. I can understand exactly the way u felt when u saw all the atrocities happening on poor animals coz im also like u. when i was in class 5th one of my neighbours asked me to get raw chicken and i went to shop without knowing what was going to happen and the butcher, killed poor chicken in front of me. I vomited on the spot and after dat incident i never had any non-veg and im strictly not in favor of atrocious behavior towards animal...

Lots of Love
NAlin
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follow me at
http://twitter.com/nalinmehra

महफूज़ अली said...

मैं आपसे बिलकुल इत्तेफाक रखता हूँ....... मैं मुस्लिम हो कर भी शाकाहारी हूँ....... और अपने त्योहारों पे कोई बलि वली नहीं देता....... मैं खुद जानवरों से बहुत प्यार करता हूँ....... इसलिए मैंने ४ कुत्ते, २ गाय. ३ भैंस, और कई सारे परिंदे पाल रखे हैं...... मेरे जानवरों को ज़रा सा कुछ हो जाता है तो मैं विचलित हो जाता हूँ...... मेरे सारे कुत्ते शाकाहारी हैं...... टमाटर , आलू , वगैरह खाते हैं......


बहुत ही सुंदर पोस्ट लगी आपकी......

महफूज़ अली said...

मैं आपसे बिलकुल इत्तेफाक रखता हूँ....... मैं मुस्लिम हो कर भी शाकाहारी हूँ....... और अपने त्योहारों पे कोई बलि वली नहीं देता....... मैं खुद जानवरों से बहुत प्यार करता हूँ....... इसलिए मैंने ४ कुत्ते, २ गाय. ३ भैंस, और कई सारे परिंदे पाल रखे हैं...... मेरे जानवरों को ज़रा सा कुछ हो जाता है तो मैं विचलित हो जाता हूँ...... मेरे सारे कुत्ते शाकाहारी हैं...... टमाटर , आलू , वगैरह खाते हैं...... ऑरकुट पे देखिएगा..... एल्बम में.... मेरे सब जानवरों कि फोटो मिल जाएगी.......




बहुत ही सुंदर पोस्ट लगी आपकी......

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

आपकी चिंता जायज है।
--------
अदभुत है हमारा शरीर।
अंधविश्वास से जूझे बिना नारीवाद कैसे सफल होगा?

पंकज शुक्ल said...

हिंसा का कोई भी बहाना हो, उसे उचित नहीं ठहाराया जा सकता।

अंशुमाली रस्तोगी said...

लेख गंभीर विषय पर है और बात भी सही कही है पर इंतजार है हमारे सुधरने का।

Alok Nandan said...

अरे, मैं तो घनघोर मांसहारी हूं...लेकिन इस आर्टिकल को पढ़ने के बाद सकते में पड़ गया हूं...जानवरों को कटते देख कर इतना गहरा असर कि आप बीमार पड़ जाती हैं...ओह....बहुती ही टची लगा यह आलेख...देखता हूं आगे मैं मांस खा पाता हूं या नहीं...मांसहार के खिलाफ जीबी शा ने खूब लिखा है...लेकिन उनकी बातों से मैं कभी इत्तेफाक नहीं कर पाया क्योंकि वो तमाम तरह के तर्क देतें है इसके खिलाफ...लेकिन आप तो अजीबो गरीब तरीके से इसे बयां कर गई...झारखंड में एक झिनमस्तिष्का मां की मंदिर है...दशहरा में नौंवी के दिन वहां पर हजारों बकरियों की बलि दी जाती है...मंदिर के बगल में नर्मदा नदी है जो खून से लाल हो जाता है...यदि आप नौंवी के दिन मंदिर के अंदर जाये तो आपका पैर खून से लाल हो जाता है...उस खून पर से गुजरने के दौरान भी कभी उन जानवरो की पीड़ा समझ में नहीं आई थी...आपका यह आलेख अब नये सिरे से सोचने पर मजबूर कर रहा है...

मीत said...

आज आपने आर्टिकल के द्वारा ऐसा मुद्दा छेड़ा है जिसे शायद देश के हर नागरिक को छेड़ना चाहिए, लेकिन अपनी समस्याओं से फुर्सत मिले तभी तो कोई बेज़बानों के बारे में कोई सोचे...???
बचपन में एक बार गुलेल का शोक चढ़ा था, मेरा निशाना बहुत अच्छा था, एक दिन शहतूत के पेड़ जो की बहुत घना था, पर मैंने आंखे बंद करके गुलेल चला दी...पेड़ से कुछ नीचे गिरा, मैंने देखा वो सबसे मासूम जानवर यानि की एक गिलहरी थी... मैंने ज्यों ही उसे उलटाया उसके मुह से गरम खून इस तरह निकला जैसे की लावा फूट पढता है. देखते ही मेरे रोंगेटे खड़े हो गए...
मैंने तुरंत वो गुलेल तोड़ कर फैंक दी.. मुझसे एक पाप हुआ था, जिसका मलाल मुझे आज तक है और शायद मरते दम तक रहेगा...आज भी वो घटना भूलने से भी नहीं भूलती...मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ...
मीत

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सार्थक लेखन!

Babli said...

मुझे आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा! बहुत बढ़िया लिखा है आपने जो काबिले तारीफ है!
मेरे ब्लोगों पर आपका स्वागत है!

रंजना [रंजू भाटिया] said...

अच्छा सार्थक लिखा है आपने इस विषय पर ..हिंसा कैसी भी हो सही नहीं है ...

sanjaygrover said...

मुझे आपका लेख इसलिए अच्छा लगा कि आपने कम-अज़-कम जानवरों में बंटवारा नहीं किया। लोगों ने तो इंसानों की तरह जानवरों को भी बांट लिया है। किसी का कुत्ता है, किसी की बिल्ली है, किसी की ऊंट है, किसी की गाय है, किसी की भैंस है, किसी का सुअर है, किसी की भेड़ है, किसी का भेड़िया है............। जानवर भी अगर सोच सकते होंगे तो ज़रुर हंसते होंगे कि कितना नंगा है ये इंसान मगर ख़ुदको सिर्फ इसलिए सभ्य समझता है कि शरीर को ढंके हुए है। पर मुझे आपकी प्रचार न करने वाली बात समझ नहीं आयी। उससे आप जैसे लोगों का दर्द तो कुछ कम होगा मगर जानवरों की समस्या तो बनी रहेगी। मसलन अगर मैं यह कहूं कि दहेज तो जारी रहे मगर उसका प्रचार न हो तो आपको थोड़ा अजीब तो लगेगा ही। असहमति के लिए क्षमा चाहूंगा मगर मैं आपके ब्लाग पर आकर अपने असली विचार छुपाकर सिर्फ वही कहूं जो आपको अच्छा लगे तो यह भी एक तरह से पाखण्ड को बढ़ावा देना ही तो होगा। शुभकामनाओं सहित..

Meenu Khare said...

सार्थक लेखन. इस सन्दर्भ में महफ़ूज़ जी की भी तारीफ़ करना चाहूँगी जो अपने त्योहारों पर बलि नहीं देते. इनके सुलझे विचारों की मैं सदा प्रशंसक हूँ. इनके जैसे उदारवादी,समझदार मुसलमानों पर मुझे गर्व है.

चंदन कुमार झा said...

जानवरो के प्रति हमदर्दी जायज है, पर जबतक मनुष्य इस धरती पर रहेगा वह मांस भक्षण करता रहेगा यह भी सत्य है ।

Arvind Mishra said...

आपने बहुत संवेदनशील और जरूरी मुद्दा उठाया है!साधुवाद !

प्रबल प्रताप सिंह् said...

आपकी चिंता सोलह आने सच है.
हिंसा के लिए हमारे बीच में कोई जगह नहीं होनी चाहिए.

tulsibhai said...

" aapki chinta jayaj hai ...bahut hi badhiya mudda uthaya hai aapne aapki abol janveroan ke prati chinta swabhavik aur dard bhari hai ."

" aapko aapki is anmol post ke liye badhai "

----- eksacchai { AAWAZ }

http://eksacchai.blogspot.com

tulsibhai said...

"aapki chinta jayaj hai bahut hi jaroori mudda uthaya hai aapne "

" kyu abol jivo ki bali chadai jati hai ? kya milta hai is se ?..bahut hi badhiya post aur is post ke liye aapko dhero badhai "

----- eksacchai { AAWAZ }

http://eksacchai.blogspot.com

सुभाष नीरव said...

आपके आलेख विचारोत्तेजक होते हैं और सोचने को विवश करते हैं। जानवरों पर होने वाले निर्मम अत्याचार को लेकर आपकी चिंता वाजिब है।

Roshani said...

Uttama ji mat yaad dilayen kurbaani ki baat man bahut dukhi ho jata hai.maine Bakrid par apne kisi bhi muslim dost ko badhaii nahi diya.
Uttama ji Hindu bhi kam nahin hote maine dekha hai ek shadi men bhains ki bali lete hue.un murgoyon ko bhi roz dekhti hun jo roj bikne ke liye taiyar rahti hain. Mainr un machaliyon ko tadpte dekha hai jo kisi ke liye nashta banti hai.
Bahut badiya likha hai aapne...likhte rahen ham aapke sath hain.

योगेन्द्र मौदगिल said...

सटीक व सार्थक पोस्ट...

mahasingh said...

i read out your blog and really it's a very sensitive issue which you have centralize in your blog a poet, a writer, a artist those who love their culture they never be escaped from these sensitive issue which you have mentioned in your blog. Your views are very precious and response of blog is also precious which can spread the message in world through internet. You have showing also your personal felling of your Nani's house these are the casual incidents which are going to be in uncivilized society only the way of education and social reformer like you could done a wonderful job in this way. This is the necessity of time we have to rethink about the death of Bejuban's. In this field Mrs. Manika Gandhi is doing a wonderful job I think that you have to inform that NGO that could be very much helpful and should not be repeated these incidents around us. This is our moral duty we have to do this job not for us only for Bejuban's. I hope that you would like to highlight such type of untouched issue. Really this is the real duty of the social reformer and artist which you are doing I would like to appreciate your efforts that should be appreciated by all also. I hope in future you would like to touch such type of issue in your blog. But we have to think about awareness in anticipation of Bejuban's death.

mahasingh said...

i read out your blog and really it's a very sensitive issue which you have centralize in your blog a poet, a writer, a artist those who love their culture they never be escaped from these sensitive issue which you have mentioned in your blog. Your views are very precious and response of blog is also precious which can spread the message in world through internet. You have showing also your personal felling of your Nani's house these are the casual incidents which are going to be in uncivilized society only the way of education and social reformer like you could done a wonderful job in this way. This is the necessity of time we have to rethink about the death of Bejuban's. In this field Mrs. Manika Gandhi is doing a wonderful job I think that you have to inform that NGO that could be very much helpful and should not be repeated these incidents around us. This is our moral duty we have to do this job not for us only for Bejuban's. I hope that you would like to highlight such type of untouched issue. Really this is the real duty of the social reformer and artist which you are doing I would like to appreciate your efforts that should be appreciated by all also. I hope in future you would like to touch such type of issue in your blog. But we have to think about awareness in anticipation of Bejuban's death.

preeti pandey said...

mam aapne apne article se hum sabhi logo ko is vishay me sochne ko majbur kar diya hai ki hum in bejubaan janwaro par ho rahe is atyachaar ka hal kaise nikaale?

ह्रदय पुष्प said...

हमें यह अच्छा नहीं लगता। हम दुखी होते हैं, घंटों रोते हैं। एक बेजुबान दम तोड़ रहा होता है। यह कहां की मानवता है?
"मैं संवेदनशील हूं और तमाम लोग मुझ जैसे हैं"

जी हाँ सही फ़रमाया - बहुत सटीक सार्थक और संवदेनशील आलेख - आभार और धन्यवाद्