चुनाव के नगाड़े बज रहे हैं, हर तरफ़ धूम मची है। चुनाव की चर्चा में बाकी काम ठप्प पड़ने लगे हैं। ऐसे में कलाजगत भला कैसे शांत बैठ जाए, सवाल दर सवाल हैं और जवाब आधे-अधूरे। चौदहवीं लोकसभा में कलाजगत के भी नुमाइंदे थे। राजबब्बर, धर्मेन्द्र, जयाप्रदा, गोविंदा जैसे कलाकार वहां थे। लोकसभा की वेबसाइट बताती है कि अन्तिम सत्र को छोड़कर जितने भी सत्र हुए, कला उपेक्षित रही। आंकडे निराशा पैदा करते हैं। राजबब्बर और जयाप्रदा की सत्रों में पर्याप्त हिस्सेदारी रही, लेकिन धर्मेन्द्र और गोविंदा ने अपने मतदाताओं को दुखी ही किया। उनकी पार्टी भी आजिज़ आ गयीं, धर्मेन्द्र की लोकसभा सीट बीकानेर में तो गुमशुदगी के पोस्टर भी चिपक गए। कला के प्रति सदस्यों की दिलचस्पी बेहद कम रही। निजी विधेयक पेश करना तो दूर की बात है, ये माननीय सदस्यगण सरकारी विधेयकों पर चर्चा में भी शामिल नही हुए। इन कलाकारों में सर्वाधिक सक्रिय सांसद राजबब्बर की भी रूचि कला से इतर अन्य मामलों में रही। करने को बहुत-कुछ था, कला की दुनिया में तमाम काम किए जाने की जरूरत थी। कला के उन्नयन को सरकारी मदद की और आवश्यकता है, लोक और जनजातीय कला दम तोड़ रही हैं। प्रतिभाएं भुखमरी के कगार पर हैं। साहित्य और ललित कला एकेडेमी जैसी सरकारी इकाइयाँ मनमर्जी पर उतारूं हैं। जिसे चाहा, अवार्ड थमा दिया और मनमर्जी से अनुदान बाँट दिया। यहाँ तक कि exhibitions तक आयोजित करने में पक्षपात है, कोई बार-बार मौका पा रहा है तो कोई चक्कर लगा-लगाकर बेहाल। जो होना चाहिए, वो नहीं हो रहा। सरकारी स्तर पर कहीं भी, कुछ पटरी पर नहीं। लोकसभा, राज्यसभा और राज्यों की विधानसभाओं में बैठे हमारे प्रतिनिधि कुछ नहीं कर रहे। यह जनप्रतिनिधि कभी अंकुश कहे जाते थे, इनकी धार कुंद पड़ गई है। सिर्फ़ ये कहकर कि सियासत गन्दी चीज़ है, कन्नी काट लेने वाले हम कलाकार अब निराशा महसूस कर रहे हैं। हम कलाकार, साहित्यकार या रंगमंच के प्रतिनिधि जनता से सीधे जुडे हैं, जानते हैं कि कलाजगत के साथ ही समाज के हर वर्ग की जरूरत क्या है? हम कुछ कर सकते हैं तो फिर करते क्यों नही? हमें आवाज़ उठानी ही होगी। वो दिन गए, जब राजनीति को अछूत मानकर हम चुप बैठ जाते थे, यहाँ तक कि मतदान के दिन भी निष्क्रिय रहते थे। वक्त आ गया है... जब जागे, तभी सवेरा।Monday, March 16, 2009
चौदहवीं के ये चाँद
चुनाव के नगाड़े बज रहे हैं, हर तरफ़ धूम मची है। चुनाव की चर्चा में बाकी काम ठप्प पड़ने लगे हैं। ऐसे में कलाजगत भला कैसे शांत बैठ जाए, सवाल दर सवाल हैं और जवाब आधे-अधूरे। चौदहवीं लोकसभा में कलाजगत के भी नुमाइंदे थे। राजबब्बर, धर्मेन्द्र, जयाप्रदा, गोविंदा जैसे कलाकार वहां थे। लोकसभा की वेबसाइट बताती है कि अन्तिम सत्र को छोड़कर जितने भी सत्र हुए, कला उपेक्षित रही। आंकडे निराशा पैदा करते हैं। राजबब्बर और जयाप्रदा की सत्रों में पर्याप्त हिस्सेदारी रही, लेकिन धर्मेन्द्र और गोविंदा ने अपने मतदाताओं को दुखी ही किया। उनकी पार्टी भी आजिज़ आ गयीं, धर्मेन्द्र की लोकसभा सीट बीकानेर में तो गुमशुदगी के पोस्टर भी चिपक गए। कला के प्रति सदस्यों की दिलचस्पी बेहद कम रही। निजी विधेयक पेश करना तो दूर की बात है, ये माननीय सदस्यगण सरकारी विधेयकों पर चर्चा में भी शामिल नही हुए। इन कलाकारों में सर्वाधिक सक्रिय सांसद राजबब्बर की भी रूचि कला से इतर अन्य मामलों में रही। करने को बहुत-कुछ था, कला की दुनिया में तमाम काम किए जाने की जरूरत थी। कला के उन्नयन को सरकारी मदद की और आवश्यकता है, लोक और जनजातीय कला दम तोड़ रही हैं। प्रतिभाएं भुखमरी के कगार पर हैं। साहित्य और ललित कला एकेडेमी जैसी सरकारी इकाइयाँ मनमर्जी पर उतारूं हैं। जिसे चाहा, अवार्ड थमा दिया और मनमर्जी से अनुदान बाँट दिया। यहाँ तक कि exhibitions तक आयोजित करने में पक्षपात है, कोई बार-बार मौका पा रहा है तो कोई चक्कर लगा-लगाकर बेहाल। जो होना चाहिए, वो नहीं हो रहा। सरकारी स्तर पर कहीं भी, कुछ पटरी पर नहीं। लोकसभा, राज्यसभा और राज्यों की विधानसभाओं में बैठे हमारे प्रतिनिधि कुछ नहीं कर रहे। यह जनप्रतिनिधि कभी अंकुश कहे जाते थे, इनकी धार कुंद पड़ गई है। सिर्फ़ ये कहकर कि सियासत गन्दी चीज़ है, कन्नी काट लेने वाले हम कलाकार अब निराशा महसूस कर रहे हैं। हम कलाकार, साहित्यकार या रंगमंच के प्रतिनिधि जनता से सीधे जुडे हैं, जानते हैं कि कलाजगत के साथ ही समाज के हर वर्ग की जरूरत क्या है? हम कुछ कर सकते हैं तो फिर करते क्यों नही? हमें आवाज़ उठानी ही होगी। वो दिन गए, जब राजनीति को अछूत मानकर हम चुप बैठ जाते थे, यहाँ तक कि मतदान के दिन भी निष्क्रिय रहते थे। वक्त आ गया है... जब जागे, तभी सवेरा।Wednesday, March 4, 2009
ज़न्नत पर बुरी नज़र

पाकिस्तान में चरमपंथ अपने चरम पर है। मुल्क की स्वात घाटी कभी अपनी जन्मजात खूबसूरती के लिए इस ज़मीन की ज़न्नत कही जाती थी। अपने कश्मीर को जब हम धरती का स्वर्ग कहते तो पाकिस्तानी स्वात पर अघाते नहीं थकते। कुछ भी हो, स्वात भी खूबसूरती की मामले में उन्नीस नही। खूबसूरती अब भी है, पर चरमपंथ का चोला ओढे आतंकवाद के ग्रहण से आतंकित। जहाँ आँखें खूबसूरत वादिओं पर टिकती थीं, वहां टेंकों और बर्बर चेहरे वाले तालिबानी आतंकवादिओं का राज है। बदहाली का यह दौर यहाँ 2002 से शुरू हुआ, जब पश्तू जन्जातीओं के राज को अफगानिस्तान से आए तालिबानिओं ने कब्जाना शुरू कर दिया। पिछले साल चुनाव में पश्तू वोटर्स ने सेकुलर अवामी नेशनल पार्टी को हुकूमत तक पहुंचाया पर असर कुछ नहीं हुआ। कलाकारों ने साथ दिया और अब खामियाजा भुगत रहे हैं। पकिस्तान कलाजगत के इस पोस्ट का विषय इसलिए नहीं बन गया कि वहां हालात काबू से बाहर हो चुके हैं और स्वात घाटी में तालिबान की हुकूमत को पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की राष्ट्रीय सरकार मान्यता दे चुकी है, बल्कि ये जिक्र इसलिए आया कि स्वात में कला की कमर तोड़ कर रख दी गई है। स्वात समेत पूरे North-West Frontier Province में कला और संस्कृति तालिबानी हमले की जद में है। कला, संगीत और पर्यटन को तहस-नहस किया जा रहा है। शरिया कानून लागू करते तालिबान ने वहां सिनेमा हॉल बंद करा दिए हैं, म्यूजिक शोप्स तोड़ दी हैं और लड़किओं के स्कूलों पर ताले डाल दिए हैं। पाकिस्तान में सबसे ज्यादा संगीत और कला के स्कूल इसी प्रान्त में थे। यहाँ 400 से ज्यादा स्कूल बंद हुए हैं और करीब 10 हज़ार लड़की और 40 हज़ार लड़के घर बैठने को मजबूर कर दिए गए हैं।
नामचीन पश्तू कॉमेडियन अलम्जेद मुजाहिद को एक हफ्ते की भय और उत्पीडन भरी कैद से बमुश्किल आज़ादी हासिल हुई है। थिएटर और सिनेमा में 300 से ज्यादा शो करने वाले 40 वर्षीय मुजाहिद अब मुस्लिम मजहबी ग्रुप तलिभी ज़मात को ज्वाइन करने वाले हैं, जीना है तो उन्हें यह करना होगा। इस्लामाबाद तक की गलिओं में तालिबान के पोस्टर चिपक जाने के बाद पकिस्तान भर से दो दर्जन से ज्यादा डांसर, सिंगर और पेंटिंग आर्टिस्ट कनाडा, जर्मनी, नॉर्वे, दुबई जैसी जगहों पर पलायन कर चुके हैं। पश्तू फ़िल्म और ड्रामा उद्योग तालिबानिओं के चाबुक से बदहाल है, कलाकार भुखमरी की मार से मरे जा रहे हैं। बात ज्यादा दिन पुरानी नहीं जब उभरते गायक सरदार युसुफजई पर गोलिआं बरसाईं गई। वो तो बच गए पर साथी कलाकार अनवर खान की मौत हो गई थी। फिर, महिला डांसर शबाना की लाश उसकी परफॉर्मेंस वाली CDs के साथ सड़क पर पड़ी मिली थी। इस्लामाबाद से अपनी 24 पेंटिंग्स लेकर आतंक ग्रस्त राज्य की राजधानी पेशावर में exhibition लगाने आई सबीना खर्दुम को न केवल जलालत व मार मिली बल्कि अपनी कला की सरेबाजार होली जलती और देखनी पड़ी। वो एक महीने से अस्पताल में हैं। भय का साम्राज्य है, किसी बस में यदि म्यूजिक की आवाज़ आ गई तो उस पर बम से हमला होता है। पेशावर की सूरत बदली सी है, अफगानिस्तान से आने वाले खैबर बाईपास से जुडा यह शहर अब न बड़ा कॉमर्शियल सेण्टर है और न अब वहां कलाकारों, व्यापारिओं का मेला जुटता है। Handicrafts, Footwear और Cotton, Silk उद्योग वीरान पड़े हैं। प्राचीन गांधार सभ्यता की मूर्तिकला के नायाब नमूने कहे जाने वाले पेशावर म्यूज़ियम का सन्नाटा तोडे नहीं टूटता। यह बता दिया गया है कि, 1950 में बनी यूनिवर्सिटी में कला, संगीत, संस्कृति और फैशन स्टडीज डिपार्टमेन्ट अब नहीं खुलेंगे। अमेरिका के घोर विरोधी रहे पाकिस्तानी भी आतंक से मुक्ति के लिए अब अमेरिका पर ही नज़रें टिकाएं हुए हैं। अफगानिस्तान में रशिया के खिलाफ खड़ा किया उनका तालिबान अब उन्हें ही डसने जो लगा है। आतंक की ये महामारी पूरे पाकिस्तान पर शिकंजा कस रही है। कलाजगत के इन खौफज़दा नुमाइंदों की तो खुदा खैर करे...
झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल से प्रकाशित दैनिक प्रभात ख़बर के 6 March के अंक में कृपया सम्पादकीय पेज पर पढिये मेरा लेख :-
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