Wednesday, March 10, 2010

आसमान हमारा कैनवस...

माना लद गया जब बहुत हुआ तो वूमैन सिर्फ वर्किंग होकर ही आगे मान ली जाती थी. हर फील्ड में पुरुष आगे थे. यहां बात अलग है, मैदान में पुरुष भी हैं और महिलाएं भी लेकिन दम के मामले में कोई भी उन्नीस नहीं. बात कर रही हूं कला की. इंडिया में विजुअल आटर्स का मैदान महिलाएं भी मार रही हैं. बड़ी संख्या हैं, कभी अस्तित्व बचाने के लिए हुई यूनिटी आज पूरा जलवा दिखा रही है. खास बात यह है कि कमाई भी खूब है और तमाम पुरुष कलाकारों से कई-कई गुना तक. कंप्टीशन खूब दिया जा रहा है. मुश्किलें भी हैं पर कामयाबियां रची जा रही हैं.
भारतीय कला की एक डेफीनेशन में इसे नारीत्व का आइना भी कहा गया है. चाहे किसी स्तर का कलाकार हो, नारी को अपने कैनवस पर उतारने की जैसे होड़ लगी रहती है. न्यूड फीमेल तो पसंदीदा करैक्टर है ही. यही सफलता का जैसे मूल मंत्र बन गया. विदेशों में भी नारी विषय पर बनीं पेंटिंग्स की डिमांड ने इस होड़ को औऱ बढ़ाने का काम किया. मुझे याद है दिल्ली की एक आर्टिस्ट, जिन्होंने अलग तरह का एक्सपैरिमेंट किया. पेंटिंग्स बनाईं और सब्जेक्ट बन गईं खुद. हर एक्जीबिशन में बतातीं कि यह मैं हूं. यह बनी-बनाई परंपरा पर
प्रहार सरीखा कदम था. मेल आर्टिस्ट्स के लिए महिलाएं फेवरेट सब्जेक्ट हुआ करती थीं, अब महिलाएं अपनी खुद की कलाकृतियों का सब्जेक्ट बनने लगीं. नतीजे भी अच्छे मिले. नलिनी मलानी अपनी पेंटिंग्स में आर्टक्रिटिक फ्रेंड गीता कपूर के साथ हैं. मुझे नहीं लगता कि अब कोई महिला या पुरुष कलाकार ऐसा होगा जिसने महिला की आकृति को कैनवस पर नहीं उतारा हो. लियोनार्डो द विंची की मोनालिसा भी महिला पात्र ही है. राजा रवि वर्मा की दमयंती-शकुंतला और पाब्लो पिकासो की अविन्यों की स्त्रियां पेंटिंग्स को भला कौन नहीं जानता. एमएफ हुसैन की विवादित ही सही तमाम पेंटिंग्स में हिंदू आराध्य देवियां यानि महिलाएं ही पात्र हैं. हुसैन की सबसे ज्यादा और महंगी बिकने वालीं पेंटिंग्स भी इनमें से ही हैं.
अमृता शेरगिल, सरोज गोगी पॉल, अंजलि इला मेनन, माधवी पारेख, जया अप्पासामी, अर्पिता सिंह, वसुंधरा तिवारी, अनुपमा सूद, अपर्णा कौर, जयश्री चक्रवर्ती, पार्वती नायर, शोभा ब्रूटा, मूर्तिशिल्प में मृणालिनी मुखर्जी उन तमाम नामों में प्रमुख रूप से शुमार हैं, जिनकी बदौलत कला में महिला कलाकारों को वेट दिया जाने लगा. फेमस पोइट महादेवी वर्मा भी चित्रकार थीं. कहा जाने लगा है कि महिलाएं अपने इमोशंस को अच्छी तरह से व्यक्त कर सकती हैं. अंजलि इला मेनन की ज्यादातर पेंटिंग्स में दुखी-गरीब स्त्रियां बंद खिड़की के आसपास दिखती हैं. माधवी पारेख ने तो फोक एलीमेंट्स की नयी स्टाइल ही डेवलप कर दी है. ग्राफिक आर्टिस्ट के फेमस ग्रुप-8 की फाउंडर मेंबर रहीं अनुपमा सूद की परफेक्ट प्रिंट मेकिंग देश-विदेश में लोकप्रिय है. मेरी एक सोलो एक्जीबिशन पर लिखा गया महिला चित्रकार की महिलाएं. ग्रुप एक्जीबिशन करने के लिए महिला कलाकारों ने अपने ग्रुप डेवलप कर लिये हैं. यह भी कामयाब रहा एक एक्सपैरिमेंट है. आर्ट की दुनिया में कदम रखने की तैयारी कर रहीं गर्ल्स के लिए यहां अब अच्छी स्थिति है. जरूरत मेहनत औऱ लगन की है. इसके साथ ही इंटरनेट वर्ल्ड भी मददगार है बशर्ते इसमें वह अपडेट रहें. वैसे, आर्ट की क्लासेज में आधी से ज्यादा तक हिस्सेदारी दिखाती है कि गर्ल्स जानती हैं और मैदान मारने को तैयार हैं.

यहां भी देखें मेरा यह लेखः-
http://inext.co.in/epaper/Default.aspx?edate=3/8/2010&editioncode=1&pageno=16

3 comments:

Arvind Mishra said...

इस विषय पर आपने अच्छी जानकारी दी है -नारी तन और मन कला और कलाकृति का पसंदीदा विषय रहा है -अब तो नारी कलाकारों के दोनों हाथों में लड्डू है -खुद कला भी और कलाकार भी -बेस्ट आफ बोथ द वर्ल्ड ! बधायी !
मगर पुरुष न्यूड महिला कालाकारों का विषय क्यों नहीं बन सकता -क्या कोई पहल हुई है इस दिशा में ?

विनीत कुमार said...

आपकी ये पोस्ट बताती है कि मेनस्ट्रीम में स्त्रियों के दखल का एक तरीका ये भी है जो कि सर्जनात्मक होने के साथ-साथ ज्यादा असरदार भी है।..

माणिक said...

aapkee post gyaanwardhak hai.