Friday, March 12, 2010

EXPRESSIONS: a solo show by uttama


इलाहाबाद संग्रहालय में दस दिवसीय मेरी प्रदर्शनी रविवार 21 मार्च को समाप्त हो गई। दर्शकों के उत्साह को देखते हुए इसे एक दिन और बढ़ा दिया गया था। यहां मैंने अपनी कामायनी, बनारस, ट्राइब्स, नेचर और कंपोजिशन टॉपिक्स पर 39 पेंटिंग्स का प्रदर्शन किया। जयशंकर प्रसाद की कामायनी सीरीज की नई पेंटिंग्स भी इनमें शामिल हैं। कमला नेहरू रोड पर चंद्रशेखर पार्क में स्थित केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के म्यूजियम में कला प्रदर्शनी का उदघाटन पुलिस महानिरीक्षक चंद्रप्रकाश ने किया। उन्होंने कहा कि चित्रों में सजीवता है। कलाकार अपने उद्देश्यों में पूरी तरह कामयाब रहा है। विजिटर बुक में आईजी ने लिखा कि उत्तमा की पेंटिंग्स उम्दा हैं, उनसे विभिन्न प्रकार के संदेश मिलते हैं। बुक में तमाम दर्शकों ने अपने कमेंट्स लिखे हैं और कृतियों को सराहा है। अंतिम दिन वर्धा निवासी हरविलास मुत्तेमवार ने मुझे लिखकर दिया कि आपकी कला पर नजरें ठहर जाती हैं। मैं इलाहाबाद में तीन दिन रहा और तीनों दिन प्रदर्शनी देखने का लोभ संवरण नहीं कर पाया। संग्रहालय आने का यह जैसे बोनस था। संग्रहालय ने आने वाले हर दर्शक को प्रदर्शनी का ब्रोशर भेंट किया।


प्रदर्शनी का कवरेज देखने के लिए निम्न लिंक क्लिक करें:-

Wednesday, March 10, 2010

आसमान हमारा कैनवस...

माना लद गया जब बहुत हुआ तो वूमैन सिर्फ वर्किंग होकर ही आगे मान ली जाती थी. हर फील्ड में पुरुष आगे थे. यहां बात अलग है, मैदान में पुरुष भी हैं और महिलाएं भी लेकिन दम के मामले में कोई भी उन्नीस नहीं. बात कर रही हूं कला की. इंडिया में विजुअल आटर्स का मैदान महिलाएं भी मार रही हैं. बड़ी संख्या हैं, कभी अस्तित्व बचाने के लिए हुई यूनिटी आज पूरा जलवा दिखा रही है. खास बात यह है कि कमाई भी खूब है और तमाम पुरुष कलाकारों से कई-कई गुना तक. कंप्टीशन खूब दिया जा रहा है. मुश्किलें भी हैं पर कामयाबियां रची जा रही हैं.
भारतीय कला की एक डेफीनेशन में इसे नारीत्व का आइना भी कहा गया है. चाहे किसी स्तर का कलाकार हो, नारी को अपने कैनवस पर उतारने की जैसे होड़ लगी रहती है. न्यूड फीमेल तो पसंदीदा करैक्टर है ही. यही सफलता का जैसे मूल मंत्र बन गया. विदेशों में भी नारी विषय पर बनीं पेंटिंग्स की डिमांड ने इस होड़ को औऱ बढ़ाने का काम किया. मुझे याद है दिल्ली की एक आर्टिस्ट, जिन्होंने अलग तरह का एक्सपैरिमेंट किया. पेंटिंग्स बनाईं और सब्जेक्ट बन गईं खुद. हर एक्जीबिशन में बतातीं कि यह मैं हूं. यह बनी-बनाई परंपरा पर
प्रहार सरीखा कदम था. मेल आर्टिस्ट्स के लिए महिलाएं फेवरेट सब्जेक्ट हुआ करती थीं, अब महिलाएं अपनी खुद की कलाकृतियों का सब्जेक्ट बनने लगीं. नतीजे भी अच्छे मिले. नलिनी मलानी अपनी पेंटिंग्स में आर्टक्रिटिक फ्रेंड गीता कपूर के साथ हैं. मुझे नहीं लगता कि अब कोई महिला या पुरुष कलाकार ऐसा होगा जिसने महिला की आकृति को कैनवस पर नहीं उतारा हो. लियोनार्डो द विंची की मोनालिसा भी महिला पात्र ही है. राजा रवि वर्मा की दमयंती-शकुंतला और पाब्लो पिकासो की अविन्यों की स्त्रियां पेंटिंग्स को भला कौन नहीं जानता. एमएफ हुसैन की विवादित ही सही तमाम पेंटिंग्स में हिंदू आराध्य देवियां यानि महिलाएं ही पात्र हैं. हुसैन की सबसे ज्यादा और महंगी बिकने वालीं पेंटिंग्स भी इनमें से ही हैं.
अमृता शेरगिल, सरोज गोगी पॉल, अंजलि इला मेनन, माधवी पारेख, जया अप्पासामी, अर्पिता सिंह, वसुंधरा तिवारी, अनुपमा सूद, अपर्णा कौर, जयश्री चक्रवर्ती, पार्वती नायर, शोभा ब्रूटा, मूर्तिशिल्प में मृणालिनी मुखर्जी उन तमाम नामों में प्रमुख रूप से शुमार हैं, जिनकी बदौलत कला में महिला कलाकारों को वेट दिया जाने लगा. फेमस पोइट महादेवी वर्मा भी चित्रकार थीं. कहा जाने लगा है कि महिलाएं अपने इमोशंस को अच्छी तरह से व्यक्त कर सकती हैं. अंजलि इला मेनन की ज्यादातर पेंटिंग्स में दुखी-गरीब स्त्रियां बंद खिड़की के आसपास दिखती हैं. माधवी पारेख ने तो फोक एलीमेंट्स की नयी स्टाइल ही डेवलप कर दी है. ग्राफिक आर्टिस्ट के फेमस ग्रुप-8 की फाउंडर मेंबर रहीं अनुपमा सूद की परफेक्ट प्रिंट मेकिंग देश-विदेश में लोकप्रिय है. मेरी एक सोलो एक्जीबिशन पर लिखा गया महिला चित्रकार की महिलाएं. ग्रुप एक्जीबिशन करने के लिए महिला कलाकारों ने अपने ग्रुप डेवलप कर लिये हैं. यह भी कामयाब रहा एक एक्सपैरिमेंट है. आर्ट की दुनिया में कदम रखने की तैयारी कर रहीं गर्ल्स के लिए यहां अब अच्छी स्थिति है. जरूरत मेहनत औऱ लगन की है. इसके साथ ही इंटरनेट वर्ल्ड भी मददगार है बशर्ते इसमें वह अपडेट रहें. वैसे, आर्ट की क्लासेज में आधी से ज्यादा तक हिस्सेदारी दिखाती है कि गर्ल्स जानती हैं और मैदान मारने को तैयार हैं.

यहां भी देखें मेरा यह लेखः-
http://inext.co.in/epaper/Default.aspx?edate=3/8/2010&editioncode=1&pageno=16

Sunday, March 7, 2010

मकबूल का यूं चले जाना

मुझे पता है कि यह हेडिंग अखबारों में आम तौर पर कब लगाई जाती है। मैं कलाकार हूं और किसी अन्य कलाकार के लिए इस तरह की बात करना भी नहीं चाहूंगी। चाहती हूं कि मकबूल हजार साल जीएं। बेशक वो कलाकार हैं। मैं या कोई और उनके कलाकार रूप में कमी निकाले तो ठीक नहीं लेकिन वह अपना देश छोड़कर चले गए। हुसैन जिस प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप (पैग) से जुड़े थे, उनमें सैयद हैदर रजा और सूजा भी विदेश गए और वहीं बस गए लेकिन अपने देश के खिलाफ बोले नहीं। हुसैन ने जो किया, उसे ढेरों कलाकार भी हजम नहीं कर पाए। फेसबुक, आरकुट जैसी कम्युनिटी वेबसाइट्स तक पर उनके विरोध में आवाजें हैं। विरोध है तो क्या, कलाकार का विरोध होता रहता है पर मकबूल का विरोध इसलिये हुआ क्योंकि उन्होंने कला का इस्तेमाल किया। अरे, हम भी कलाकार हैं। कला बनाएं, तो लोग समझें। खुश हो या नहीं, फर्क नहीं पड़ता। लोगों को आनंद मिले या नहीं, शायद कभी-कभी यह भी मुद्दा नहीं होता लेकिन लोग समझें नहीं तो हम जबरन समझाने लगें? एक महिला बनाएं और नीचे लिखकर समझाएं कि यह देवी सरस्वती, पार्वती या दुर्गा हैं, यह ठीक है क्या? साफ कह दिया कि भारत ने मेरा बहिष्कार किया इसलिये मैं कतर की नागरिकता स्वीकार कर रहा हूं। उन्हें शिकायत है कि दक्षिणपंथी संगठनों ने उनके मुस्लिम होने पर नहीं बल्कि कला और अभिव्यक्ति पर हमला किया था। मैंने सिर्फ अपनी आत्मा की अभिव्यक्ति को उकेरा था। वो कहते हैं कि मुझ पर हमला हुआ तो सरकार, कलाकार और बुद्धिजीवी सब चुप रहे। नेताओं के लिए सिर्फ वोट अहम हैं। मकबूल वहां तक पहुंचे कैसे अगर उनके खिलाफ भारत में इतना खराब माहौल था? मैं जानती हूं कि न्यूड फिगर बनाना अपराध नहीं बल्कि जब कला की जरूरत होती है तब बनानी होती है। पर जरूरत सिर्फ एक ही तरह के चित्रों में हो, मकसद विवादित होकर प्रसिद्धि पाना हो तो गलत है। हमेशा हिंदुओं के आराध्यों में ही उन्हें क्यों न्यूडिटी दिखाई दी। मेरे पास उनकी कलाकृतियों की फोटो हैं, लगा रही हूं इस पोस्ट के साथ जो उनके अपनों की है और शालीन वेशभूषा में (संलग्न चित्र उनकी मां, बेटी और एक मुस्लिम महिला की पेंटिंग के हैं)। क्यों उन्होंने अपनी मां को बख्श दिया, मां ने भी तो कभी उन्हें दूध पिलाया होगा। वह अंग उन्हें क्यों नहीं दिखाई दिए, उन अंगों की वह कल्पना क्यों नहीं कर सके? अरे, मां की पेंटिंग बनाते तो वल्गैरिटी भी नहीं दिखती और चर्चा भी मिलती क्योंकि मां तो मां है। मां तो तमाम कलाकारों का सब्जेक्ट बनी है। हुसैन क्या थे? भारत ने उन्हें बनाया। कला और अभिव्यक्ति की उनकी आजादी पर प्रहार हुआ तो हमलावरों से हजारों-लाखों गुना ज्यादा लोग उनके साथ खड़े थे। यह उनके प्रशंसक थे, हिंदू या मुसलमान नहीं थे। जिस मुस्लिम देशों में जाकर वह भारत के खिलाफ बोल रहे हैं, वहां धारा के खिलाफ मुंह खोलकर तो देखें। सरेआम कोड़े पड़ते हैं, हाथ काट लिये जाते हैं। देश आज भी उनके स्वागत के लिए तैयार था। तस्लीमा भी विवादित हैं लेकिन सुरक्षित भी यहीं हैं। वोट की सियासत होती है यहां लेकिन तुष्टिकरण की राजनीति करने वालों के राज में तस्लीमा जैसे भी महफूज हैं। हुसैन को इस देश से बहुत-कुछ मिला है, कुछ सुन लिया तो दुख कैसा? फिर बोलने वाले बहुसंख्यक तो नहीं थे बल्कि बहुसंख्यक समुदाय के अल्पसंख्यक थे। हुसैन ने गलत फैसला किया। वह कई साल से देश से बाहर रह रहे थे, आज अचानक ऐसी नौबत क्यों आ गई कि भारतीय नागरिकता छोड़ दी। पूरी उम्र कमाते रहे आप, 93 साल में भारत बुरा लगने लगा। इसके पीछे वजह हैं, शायद भारत के विरुद्ध किसी देश का इंस्ट्रूमेंट बन गए वो। एमएफ हुसैन, हमें आपसे यह उम्मीद नहीं थी। आपकी कलाकार बिरादरी को तो बिल्कुल ही नहीं।

(उनकी मां)

(उनकी बेटी)

(एक मुस्लिम महिला)











(सरस्वती)

Tuesday, March 2, 2010

विवाद का स्थाई विषय-तस्लीमा

तस्लीमा नसरीन का जैसे विवादों से चोली-दामन जैसा साथ है। जहां तस्लीमा, वहां विवाद। इस बार तो बेवजह बवंडर में फंस गईं। लिखा भी नहीं कि मोहम्मद साहब बुर्के के विरोधी थे पर मीडिया ने तान दिया और दंगे भड़क गए। तस्लीमा नाम की आग ने कई बार झुलसाया है। तस्लीमा हैं क्या, क्यों होती है उनकी चर्चा और विवाद? क्यों वो अखबार की सुर्खियां बनती हैं? दरअसल, तस्लीमा हैं इसलिये खबर हैं। वो अपने आप में ऐसी शख्सियत हैं कि लोगों को हजम नहीं हो पातीं। वो आग उगलती हैं और लोग जलने लगते हैं। वो महिला हैं, यही ज्यादा तकलीफ का विषय है। कोई महिला धारा के खिलाफ बहने की कोशिश करे तो क्यों पेट में दर्द होने लगता है? लगता था कि दब जाएंगी, कलम के साथ सिर झुक जाएगा। हिंदुस्तान आईं तो सोचा कि एक धर्मनिरपेक्ष राज्य में शरण मिलेगी, शांति के साथ सम्मान मिलेगा। चैन से जी पाएंगी लेकिन तुष्टिकरण ने बेड़ा गर्क कर दिया। मुस्लिम नाराज न हो जाएं इसलिये कांग्रेस की सरकार ने उन्हें ज्यादा तवज्जो नहीं दी। छोटा सा सवाल है, क्या कट्टरपंथ में पाकिस्तान से थोड़ा पीछे बांग्लादेश में सिर्फ चर्चा में आने के लिए कुछ लिखने से पैसा मिल सकता है? तस्लीमा को पढ़ा है मैंने, प्रभावित हूं उनसे। तस्लीमा जो लिखती हैं सच्चाई के बेहद करीब होता है। हम हिंदू हों या मुस्लिम, क्या अंतर है हमारी मानसिकता में? पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बच्चों पर काम करने वाले एक संगठन की कार्यकर्ता ने मुझे बताया था कि बाल शोषण की घटनाओं में मुस्लिमों से हिंदू भी पीछे नहीं। परिवार के भीतर ही कुछ भी होता रहे, वहां न धर्म चलता है औऱ न जाति। तस्लीमा ने एक सीमा के बाहर शोषण पर औरत का विद्रोह लिखा। औऱत है तो क्या शोषण सहना नियति है, बिल्कुल नहीं औऱ न इस शोषण के विरुद्ध कलम या कूंची से आवाज उठाना गलत. नारीवाद से संबंधित विषयों पर अपनी प्रगतिशील विचारों के लिये चर्चित और विवादित रही तस्लीमा ने स्वाभिमान और अधिकारों के लिए संघर्ष करते हुए बहुत-कुछ खोया। अपना भरा-पूरा परिवार, दाम्पत्य, नौकरी सब-कुछ दांव पर लगा दिया। उसकी पराकाष्ठा थी देश निकाला। तस्लीमा बेशक मान्यताओं के खिलाफ काम करती रहीं और तीन निकाह हुए उनके मुस्लिमों के निकाह और तलाक में महिला की कितनी भूमिका होती है, सब जानते हैं। वो घर में बैठी और किसी पर निर्भर कोई आम महिला नहीं थीं बल्कि ढाका मेडिकल कॉलेज में डॉक्टर थीं। पैसा कमाना कोई बड़ी बात नहीं थी, पर वो इस तरह की महिला थीं जिसने दुनिया की परवाह किए बगैर चलने का दम दिखाया। ... और यह तो पराकाष्ठा है, एक अखबार चर्चा में आने के लिए मनगढंत लिख देता है और हम सिर्फ इसलिये कि तस्लीमा का नाम है, भिड़ जाते हैं। लाशें बिछाने लगते हैं। कब तक चलेगा यह? बस करिए, कला औऱ साहित्य को इससे बख्शिए। बोलना ही है तो बोलिए लेकिन सीमाओं में, स्वस्थ मानसिकता से।