Friday, March 11, 2011

ब्रश के बिना भी आर्ट वर्ल्ड !

देखते ही देखते चित्रकला की दुनिया कितनी आगे पहुंच गई. उम्मीद से तेज प्रोग्रेस हुई है इस फील्ड में. पहले मीडियम लिमिटेड थे, इमैजिनेशन को उनकी ही बदौलत आकार देना होता था पर अब मीडियम बहुत है. आप जिस पेंटिंग को देख रहे हैं, वह जरूरी नहीं कि महज ब्रश पर हाथों की कमांड का कमाल हो. हो सकता है कि उसे बनाने के लिए आर्टिस्ट ने ब्रश यूज ही नहीं किया हो बल्कि डिफरेंट टूल से वो पेंटिंग बनाई हो. पहले महीनों-बरसों भी लग जाते थे एक पेंटिंग के बनने में, वो पेंटिंग शायद बहुत कम समय में बनी हो. बड़े बदलाव आए हैं कला की दुनिया में. टेक्निक में प्रोग्रेस की जो खबरें पहले इंडिया आने मे बहुत देर ले लेती थीं, वह अब इंटरनेट की बदौलत कुछ मिनिट्स में सुलभ हैं. आर्ट वर्ल्ड में चेंजेंस का सबसे बड़ा रीजन भी यही है. करीब 12 साल पहले दिल्ली की एक गैलरी में एक्जीबिशन लगी थी, टॉपिक था चेंज इन द वर्ल्ड. आर्टिस्ट ने ब्रश का यूज किए बिना सारी पेंटिंग्स बनाई थीं पर ज्यादातर में हाथ का इस्तेमाल हुआ था. अंगुलियों से तरह-तरह की इम्प्रेशन देकर उसने अपनी कला सजाई थी. यह इंडिया के लिए नयी बात थी. इसके बाद आज तक तो जैसे सब-कुछ बदल जाने को बेताब है.
फेमस आर्टिस्ट रामेश्वर बरूटा अपनी पेंटिंग्स में एक-एक करके अलग-अलग रंगों की परत लगाते हैं और फिर, जो रंग चाहिये उसे खुरच कर निकाल लेते हैं ताकि पेंटिंग्स में कई लेयर्स के साथ ही मनचाहा कलर इफेक्ट आ जाए. ब्लेड्स इसके लिए यूज होते हैं. जयपुर के एक कलाकार ऐसी पेंटिंग्स बनाते हैं जिनसे तीन साल तक फूलों की तरह खुशबू निकलती रहती है. लंबे समय तक खुशबू के लिए वह मेंहदी, गुलाब और खस के सेंट का यूज करते हैं. आर्टिस्ट्स छोड़िए, आर्ट स्टूडेंट कमाल दिखा रहे हैं. कैम्लिन अवार्ड विनर स्टूडेंट ने अपनी पेंटिंग में छोटे बाथरूम वाईपर का यूज किया. इन्हीं अनूठे बदलावों का ही एक्जाम्पल है, धुएं से बनी पेंटिंग्स. इस तरह की पेंटिंग्स में रंगों और ब्रशों की बजाए लौ के ऊपर कैनवस को घुमाकर पेंटिग को बनाया जाता है. लय यानि रिदम का कमाल है यह पेंटिंग्स. इस तरह की पेंटिंग्स के लिए बहुत ज़रूरी होता है कि इन्हें एक ही बार में बना लिया जाए. हमेशा एलर्ट भी रहना पड़ता है कि कितनी लौ चाहिए. कभी-कभी तो कैनवस के जलने का भी ख़तरा रहता है. एक नवोदित कलाकार को मैं जानती हूं जो स्क्रबिंग ब्रश का भरपूर इस्तेमाल करता है. कैनवस पर पेंट करने के बाद वह इस ब्रश की सींकों से अलग इफेक्ट दिखाता है. एक स्टूडेंट ट्रांसपेरेंट टेप से कैनवस का वह हिस्सा छिपा लेता है जिस पर बाद मे उसे दूसरा रंग देना होता है. उसकी यह टेक्निक पानी पर बिखरे फूलों की शानदार पेंटिंग बना देती है. एक स्टूडेंट हाथ की अंगुलियो में तीन पेंसिल फंसाकर स्केच बनाता है और बाद मे उसमें रंग भरता है. म्यूरल इफेक्ट के लिए रंगों के गोलों को दूर से कैनवस पर फेंकना भी इसी तरह की टेक्निक है. फैन की तेज हवा, फाउंटेन पेन इंक के ड्राप्स, बाउल्स-स्पून्स औऱ न जाने क्या-क्या, आर्ट की दुनिया इस समय बदलाव की स्टोरी लिखने में लगी है. उसके नए मेंबर्स ज्यादा सोच और रच रहे हैं जो स्टैब्लिश्ड आर्टिस्ट्स के लिए चुनौती हैं. इसी का नतीजा है कि स्टूडेंट लाइफ में बात पॉकेट मनी और पढ़ाई का खर्चा निकालने से आगे बड़ी कमाई तक पहुंच गई है. स्टूडेंट्स अपना दम साबित कर रहे हैं, वह भी ऐसे नए आईडियाज को बदौलत.

Wednesday, January 5, 2011

अनीश कपूर का आर्ट वर्ल्ड

इमेजिन कीजिए कि गोले की जगह एक तोप रंग बरसाए और एक ब्यूटीफुल आर्ट आइटम रच दे. लोग आएं और उससे रंग भरे गोले दागें और दीवार पर अनूठा म्यूरल बना दें या फिर, यह बड़े मिरर में आप किसी शहर की इमेज देख पाएं. सचमुच, प्राउड फील होता है कि इंडियन ओरिजिन का एक आर्टिस्ट लंदन में ऐसी कलाकृति बना रहा है जिसकी तुलना फ्रांस की आइफिल टॉवर से की जा रही है. नवंबर 2011 में यह टॉवर बनकर तैयार हो जाएगी यानि नए साल में हम इंडियन्स की सक्सेस स्टोरीज़ में एक पन्ना और जुड़ने वाला है. यह आर्टिस्ट जो जो-जो रच रहा है, वो आर्ट की हिस्ट्री में कभी देखने को नहीं मिला.
इस बार मैं लंदन बेस्ड इंडियन अनीश कपूर की बात करने जा रही हूं. हाल ही में अनीश की दिल्ली की नेशनल गैलरी आफ मॉडर्न आर्ट और मुंबई के महबूब स्टूडियो में एक्जीबिशन हुई. यह वही आर्टिस्ट हैं तीन साल पहले जिनकी एक पेंटिंग आक्शन कंपनी सॉदबी ने 28 लाख डॉलर में बेची थी. वहां 2012 में होने वाले ओलंपिक गेम्स को यादगार बनाने के इरादे से दो करोड़ पाउंड की लागत से बन रही एक खास मीनार को डिजाइन करने वाले स्क्ल्पटर यही हैं. इसका नाम होगा आर्सेलर मित्तल ऑर्बिट. 115 मीटर ऊंची इस लोहे की मीनार के लिए पैसा इंडियन इंडस्ट्रिलिस्ट लक्ष्मीनिवास मित्तल देंगे और इसकी डिजाइन बनायी है अनीश ने. स्ट्रेटफर्ड एरिया में ओलंपिक स्टेडियम के पास बन रहे गीज़ा के पिरामिड जितनी हाइट वाले टॉवर पर दो रेस्त्रां होंगे और दो लिफ्टों से हर घंटे 700 लोग ऊपर बने पैवेलियन पर जा सकेंगे. इसमें 1400 टन स्टील यूज होगी. गर्व की बात यह भी है कि एंटनी ग्राम्ली जैसे मशहूर शिल्पकार इसे बनाने की रेस में शामिल थे. अनीश हिस्ट्री रच रहे हैं. उनकी आर्ट में वो एक्पेरिमेंट्स हैं जो पहले कभी नहीं हुए. उनका एक और वर्क एक मिरर है जो स्टील की बड़े साइज ट्रांस्पेरेंट लेयर्स से बना है जिन पर पॉलिश की गई है. दस मीटर डायमीटर के इस मिरर का वेट 23 टन है. इसे वह कई शहरों में एक्जीबिट कर चुके हैं. उन्हें 11 सितंबर 2001 को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमलों में मारे गए ब्रिटिशर्स की याद में एक मॉन्यूमेंट बनाने का भी काम सौंपा गया है. करीब साढ़े 19 फुट की यूनिटी नामक इस आकृति को हनोवर चौक के स्मारक पार्क में प्रमुखता से प्रदर्शित किया जाएगा. यह चौक न्यूयॉर्क के दो टॉवरों के नजदीक है. अनीश को स्थान और सामग्री के बेहतर कांबिनेशन के लिए जाना जाता है. आर्ट क्रिटिक्स मानते हैं कि उनकी कृतियों में द्वंद्वात्मक विशेषता झलकती है, जैसे प्रजेंस बनाम एब्सेंस, एक्चुअल बनाम इमेजनरी आदि. एक्जीबिशन के समय दिल्ली की गैलरी में अनीश पर चल रही एक डॉक्यूमेंटरी से मुझे भी पता चल रहा था कि एक आर्टिस्ट का इमेजिनेशन कहां-कहां तक पहुंच सकता है. मैनहट्टन के इंस्टॉलेशन में उन्होंने एक तोप रखी, जिसमें रंगों से भरे गोले लोड किए जाते और दर्शक आते और उन्हें दागते. इसके बाद दीवारों पर रंगों का एक अजूबा म्यूरल उभर आता. इंडियन विजुअल आर्ट में ‘ऐतिहासिक और पारंपरिक कलाओं’ की जगह ‘पॉप कल्चर और एब्स्ट्रेक्ट आर्ट’ का फेवर लेने वाले मुंबई में जन्मे इस आर्टिस्ट ने मिरर्स का कई बार यूज किया है. उनकी कृति सी मिरर में प्लेटफॉर्म पर लगे एक मिरर से समुद्र का नज़ारा दिखता है. मिरर हेवेन में अनूठी इमेजेस रची गई हैं. टेमेनॉस में उन्होंने समुद्र किनारे बनाए इंस्टॉलेशन में एक नेट को आयरन पोल पर कसा गया है. अनीश ने आर्ट की डेफिनेशन को ही बदल दिया है, उनकी विशाल कृतियों में आर्ट के साथ आर्किटेक्चर घुलामिला है. गैलरी में रखी कमेंट बुक बता रही थी कि उनसे इंप्रीरेशन ले रही नई जेनरेशन के पास भी ऐसे आईडियाज हैं. मतलब यह है कि अनीश जैसों के शुरू किए एक्पेरिमेंट्स का सिलसिला लंबा चलेगा जो आर्ट वर्ल्ड के लिए आनंद की वजह बनता रहेगा.

यहां देखें मेरा यह आलेखः-
http://www.inext.co.in/epaper/inextDefault.aspx?pageno=16&editioncode=1&edate=1/5/2011

Saturday, December 4, 2010

मेरी कलाकृतियां ..अहा जिंदगी.. में

देश की सर्वाधिक प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में शुमार ..अहा जिंदगी.. के दिसम्बर 2010 अंक में भी मेरी कलाकृतियां प्रकाशित हुई हैं। शुरुआत हुई है पृष्ठ संख्या 10 से, जहां आवरण कथा के साथ मेरी वुमैन सीरीज की एक पेंटिंग प्रकाशित है। ख्यातिलब्ध साहित्यकार मैत्रैयी पुष्पा के लेख ..बंदिशें और सामंती शिकंजे टूट रहे हैं.. के साथ इसी सीरीज की मेरी दूसरी पेंटिंग है। यह सीरीज मैंने हाल ही में इलाहाबाद संग्रहालय, इलाहाबाद में केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय द्वारा प्रायोजित अपनी प्रदर्शनी के लिए बनानी शुरू की थी। खास तौर से अहा जिंदगी के लिए बनायी पेंटिंग्स के साथ इस सीरीज में कुल पेंटिंग्स की संख्या अब 16 हो गयी हैं, जिनमें मैंने एक औरत के अलग-अलग मूड्स प्रदर्शित किए हैं। आवरण कथा के ही दूसरे आलेख में सुप्रसिद्ध लेखिका अनामिका के लेख के साथ मेरी इस सीरीज की तीसरी पेंटिंग छपी है। अगले पृष्ठ पर ..गार्गी ने सदियों पहले एक परंपरा तोड़ी थी.. के साथ मेरी चौथी पेंटिंग है। इस प्रतिष्ठित पत्रिका ने मुझे यह मौका दूसरी बार दिया है। इससे पहले नवम्बर अंक में साहित्यकार प्रतिभा कटियार की कहानी .. अमलताश होती लड़की की कथा.. के साथ मेरी नेचर सीरीज की पेंटिंग प्रकाशित हुई थीं। दिसम्बर अंक में आपकी चिट्ठियां कॉलम में प्रतिभा जी की कहानी की सराहना करने वाला उदयपुर (राजस्थान) निवासी इमरान खान का जो पत्र छपा है, उसके साथ भी मेरी यह पेंटिंग प्रकाशित हुई है। दैनिक भास्कर समाचार पत्र समूह की यह पत्रिका हिंदी जगत की सर्वाधिक लोकप्रिय साहित्यिक पत्रिका है। यह पत्रिका उन क्षणों में साथ देती है जब मन में कहीं निराशा जग जाए, और यह निराशा तो हर व्यक्ति में कभी न कभी जगती ही है। यह जीवन के उल्लास से आपका दोबारा परिचय कराने लगती है। इसलिये भी, मैं इसकी फैन हूं। बिल्कुल अलग शैली की इस पत्रिका की मैं पिछले छह साल से नियमित पाठक हूं। ऐसे में यहां अपनी कलाकृतियों को प्रकाशित देखकर मैं प्रफुल्लित हूं।

यहां देखें अहा जिंदगी-
http://www.bhaskar.com/magazine/aha-zindagi/

Thursday, December 2, 2010

इंस्टॉलेशनः नए ज़माने की कला

यह कला का बिल्कुल अनूठा रूप है जिसे इंस्टॉलेशन कहा जाता है। नए जमाने की कला, मुश्किल लेकिन सफलता की गारंटी। भारत हो या विदेश, सभी जगह चलन में आ रहा है इंस्टॉलेशन। छोटे-बड़े सभी आर्टिस्ट या तो हाथ आजमा चुके हैं या योजना बनाने में जुटे हैं। अजब-गजब इस कला के चाहने वालों की संख्या में होती तेज वृद्धि बताती है कि आम-खास सभी कलाप्रेमी इसे अपना चुके हैं। यह पेंटिंग की तरह टू नहीं बल्कि थ्री डायमेंशनल आर्ट है और यह उन चीजों से भी बनाया जा सकता है जिसे बेकार मान लिया गया हो। आज आर्ट की परिभाषा बदल गई है, उसे बनाने और दिखाने का तरीका भी बदला है। रचनात्मकता कला का मूल है जिसके बिना कला संभव ही नहीं। कलाकार जो देखता है, वही रचे तो हो सकता है कि कहीं नीरसता आ जाए इसलिये उसे अपनी कल्पनाशक्ति से कंटेंट डालने होते हैं। पुराने समय में पौराणिक पात्रों पर बनी पेंटिंग्स को याद कीजिए, यदि प्रकृति के कुछ अवयव नहीं डाले गए होते तो क्या यह पेंटिंग्स इतनी खूबसूरत बनतीं और लोग पूजा-पाठ तक में उनका प्रयोग करते? आर्टिस्ट की रचनात्मकता ने ही उन्हें इतना खूबसूरत बनाया।
इंस्टॉलेशन भी इसी रचनात्मकता का नतीजा है। कला की आर्ट की नई परिभाषा से ही पैदा हुए इंस्टॉलेशन में आर्टिस्ट वीडियो, पेंटिंग और स्कल्पचर आर्ट को मिला देता है। वह कुछ भी दिखा सकता है झोपड़ी, बर्तन, कारें, साइकिल लेकिन इनके म़ॉडल नहीं बल्कि वास्तविक वस्तुएं यानि असली झोपड़ी या कारें या कोई भी ऐसी वस्तु। जहां कई कलाएं मिल जाएं, वहां इंस्टॉलेशन आर्ट जन्म लेती है। कहा जाता है कि यह मीडियम उन लोगों के लिए ज्यादा मुफीद है जो अपनी बात को पेंटिंग या स्कल्पचर में बेहतर तरीके से नहीं कर पाते। लंदन के एक शॉपिंग सेंटर में आर्ट के लिए करीब पांच सौ लोग न्यूड हो गए। न्यूयॉर्क के आर्टिस्ट स्पेन्सर ट्यूनिक के इस इंस्टॉलेशन का मकसद था लोगों को दिखाना कि हम जो चाहें करें तो तनावभरे जीवन को अलविदा कहा जा सकता है। इनमें ज्यादातर लोग युवा थे। इसी तरह पांच से 95 साल की उम्र के 240 लोग मूर्तिकार एंथनी गोर्मली के लिए अपने शरीर को एक प्लास्टिक की पतली चादर से लपेटने को तैयार हो गए थे। प्रसिद्ध कलाकार मकबूल फिदा हुसैन भी सिर्फ कागज ही कागज बिखेरकर श्वेतांबरी नामक इंस्टॉलेशन बना चुके हैं। विवान सुंदरम तो इंस्टॉलेशन आर्ट में इतने रम गए कि पेंटिंग करना छोड़ ही दिया। विवान ने बाबरी मस्जिद के ढहने पर मेमोरियल नाम से स्कल्पचर और फोटोग्राफ्स का एक इंस्टॉलेशन बनाया। रणवीर सिंह कालेका, सुबोध गुप्ता और नलिनी मलानी भी पूरी तरह इसी फील्ड में उतर चुके हैं। दिल्ली में हुई एक प्रदर्शनी में आर्टिस्ट ने अपना इंस्टॉलेशन 'दादी मां का अचार' एक्जीबिट किया। इंस्टॉलेशन में तीन तलों की मेज पर शहरी दुनिया की चीजें बॉक्स, सेलफोन, कंप्यूटर आदि को एक बोतल में बंद कर यह संदेश दिया गया कि आज का जीवन पूरी तरह मशीनों और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसों में उलझ चुका है। एक अन्य इंस्टॉलेशन में एक टेंट है जिसमें मधुमक्खियों का छत्ता और एक लैपटॉप है, एक आदमी लेटकर पुस्तक पढ़ रहा है। मंशा है जीने का अंदाज दिखाने की। मधुमक्खी का छत्ता एकजुटता और संयुक्त परिवार के लाभ बताता है जबकि लैपटॉप अकेलेपन को दर्शा रहा है। बड़े शहरों में बढ़ती भीड़ की परेशानी दिखाने के लिए एक आर्टिस्ट ने इंस्टॉलेशन बनाया जिसमें मशीनें हैं, और हैं पसीने से तरबतर लोग। इनमें लगी बहुत सी चीज़ें घूमती हैं और तरह-तरह की आवाजें निकालती हैं तो लगता है जैसे शहर का कोई हिस्सा जीवंत हो उठा है। शोर से परेशान आदमी के कान कागज लगाकर बंद कर दिए गए हैं। दिल्ली में ऐसी ही एक और एग्जीबिशन लगाने वाले एक आर्टिस्ट का कहना था कि तमाम चीजों के आपस में मिलने से कला का कैनवस बड़ा हो गया है और चीजें आपस में सिकुड़ गई हैं। हम ऐसे समय में जी रहे हैं, जहां दुनिया कभी भी ठप हो जाए। ऐसे में हम 19वीं सदी के रोमांस को लेकर क्यों जीएं? बिल्कुल सच है यह। आर्ट ने तो वैसे भी अनूठी और रोचक दुनिया रचने का कारनामा कई बार कर दिखाया है और इस बार वह हकीकत से रूबरू कराने का काम बखूबी कर रही है। नई पीढ़ी के कलाकारों क रुचि और कलाप्रेमियों के रुझान से तो यही लगता है।

Tuesday, November 23, 2010

इन गलियों में भी बसती है कला...

यह गलियां जनजातियों की बसावट वाली है। गंदी और सामान्य जन सुविधाओं के अभाव से त्रस्त इन गलियों की कला अलग पहचान है। कला और इन जनजातियों के बीच सनातन सम्बन्ध है। पुरातन कला की जब भी बात होती है तो जनजातियों का जिक्र जरूर आता है। और तो और... भारत की सांस्कृतिक धरोहरों का उल्लेख हो और जनजातियों की भूमिका न देखी जाए, यह भी संभव नहीं। अंधाधुंध आधुनिकीकरण के दौर में आज भी इन जनजातियों की कला जीवित है। समृद्ध भारतीय संस्कृति में इन जनजातियों की बड़ी भूमिका है। मैंने जनजातियों की कलात्मक पहचान पर एक शोध किया है। करीब ढाई साल की अवधि में हुए इस शोध के दौरान मैंने उन तमाम शहरों का दौरा किया जहां जनजातियां रहती हैं और जीवन-यापन के लिए ही सही, कला सृजन में जुटी हैं। इन जनजातियों के रहन-सहन देखकर प्रतीत होता है कि भारत कला के मामले में उससे ज्यादा समृद्ध है जितना नजर आता है। इन जनजातियों की रग-रग में कला है। त्यौहारों और सामाजिक समारोहों में यह जो कला रचते हैं, वह भारत की पुरातन कलाओं में से एक है। शहर जब इतने विकसित नहीं हुए थे, तब उसमें में भी यह कलाएं दिखती थीं। घरों में महिलाएं गोबर से लीपती थीं, दरवाजे और दीवारों पर घर में ही रामरज और हल्दी जैसी आसानी से मिल जाने वालीं वस्तुओं से विभिन्न आकृतियां उभारती थीं। समय बदला और इन आकृतियों की जगह कैलेंडरों और अन्य प्रकाशित चित्रों ने ले ली। परंतु जनजातियों ने यह सब नहीं छोड़ा। महंगाई की मार से यह भी बेहाल हैं लेकिन कलाएं अब भी रचती हैं। बेशक, कहीं-कहीं गरीबी की वजह से हल्दी जैसी वस्तुओं की जगह सस्ते पीले रंग और यहां तक कि चिकनी मिट्टी तक ने ली है। पहले यह लोग सुतली के मंथकर किसी महिला की गुंथी चोटी की तरह बनी बेलों से अपनी बनाई डलियों को सजाते थे। अब रंग-बिरंगे कागजों से यह काम कर रहे हैं। हालांकि पहले मंथी हुई सुतली से सजी डलिया भी बन रही हैं और उन्हें ज्यादा दाम मिल रहा है। समस्या यह है कि उन डलियाओं को बनाने के लिए कच्चा माल मिलने में मुश्किल आती है क्योंकि यह रंगीन कागजों से महंगा है। इसी तरह लघु उद्योगों में बन रहे आकर्षक दौने-पत्तलों से इनकी रोजी-रोटी बुरी तरह प्रभावित हुई है। इन जनजातियों के बनाए दौने-पत्तल पहले शहरों की दावतों में भी खप जाते थे पर अब महज कुछ गांवों में ही बिक पाते हैं। इनके कुछ परिवारों ने इसे चुनौती के रूप में लिया और किनारे धागों से सजाकर पत्तल और दौने सुंदर बना दिए। कूंचे के रूप में मशहूर इनकी बनाई झाड़ू आज भी खूब प्रयोग हो रही है। सींकों की झाड़ू भी ज्यादातर यही परिवार बना रहे हैं जो व्यापारी सस्ते दामों में खरीदकर बाजार तक पहुंचा देते हैं। और भी तमाम तरह की कलाएं हैं यहां। ढोलक भी यही लोग बनाते हैं। कलात्मक चटाइयां, बैल-गायों को बांधने वाली रस्सी, गांवों में दूध रखने के लिए प्रयोग होने वाले छींके इनके अन्य उत्पाद हैं।
यह जनजातियां देश के हर राज्य में मौजूद हैं लेकिन संख्या में ज्यादा नहीं। अकेले उत्तर प्रदेश की बात करें तो 1991 की जनगणना के अनुसार इनकी संख्या मात्र दो लाख 87 हजार 901 थी। 2001 में हुई जनगणना में राज्य की कुल जनसंख्या 16 करोड़ 60 लाख 52 हजार के आसपास मापी गई तब जनजातियों की संख्या में मामूली वृद्धि हुई थी। यह वृद्धि अन्य जातियों की वृद्धि की तुलना में बेहद कम थी। इसी राज्य के बाराबंकी जिले का उदाहरण लें तो पता चलेगा कि जिले में अन्य जातियों के मुकाबले यह महज 0.2 प्रतिशत थीं। संख्या में बढ़ोत्तरी की दर कम होने का अर्थ यह माना गया कि यह जनजातियां अब अपनी पहचान छिपाना ज्यादा पसंद करती हैं और साथ ही अपने परिवार के बच्चों के रिश्ते अन्य जातियों में करने को प्राथमिकता दे रही हैं। लेकिन जनजातियां जहां भी अधिक संख्या में रहती मिलती हैं, वहां लोककलाएं ढूंढने के लिए ज्यादा प्रयास नहीं करना पड़ता। इनके घर-घर में कलाएं हैं। घर में प्रवेश करते ही कला से जो साक्षात्कार शुरू होता है, वह जीवन-यापन का माध्यम जानने तक चलता रहता है। सरकारी योजनाओं का लाभ मिला है इन्हें लेकिन उतना नहीं, जितना जरूरी है। फिर भी उपलब्ध संसाधनों के जरिए ही यह अपनी कलाओं के संरक्षण में जुटी हैं। सरकारी सेवाओं में आरक्षण का प्रावधान होने के बावजूद यह जातियां उसका लाभ नहीं उठा पातीं क्योंकि शिक्षा का अभाव है। जनजातियों के बच्चे निर्धनता के चलते शुरू में ही स्कूल जाना बंद कर देते हैं। वजह यह है कि उन्हें अपने साथ ही परिवार का पेट पालना होता है। पहले यह जनजातियां सामाजिक रूप से उपेक्षा की शिकार थीं लेकिन कलाओं ने उन्हें अन्य जातियों से मिलने-जुलने का अवसर प्रदान किया। इसके बाद स्थितियां बदलने लगी हैं। अपनी कलात्मक पहचान की वजह से जनजातियों की सामाजिक समारोहों में भागीदारी होने लगी है। विवाह हो या संतान प्राप्ति के बाद अन्य कोई अनुष्ठान जैसा हर्ष का कोई मौका, हर जनजातियां समारोहों में सक्रिय भागीदारी करती हैं। मध्य उत्तर प्रदेश के जिलों में विशेष रूप से मैंने पाया कि समय का बदलाव पहचानते हुए कलाओं की अन्य और बिकाऊ शैलियां इन जनजातियों ने विकसित कर ली हैं हालांकि परंपरागत कलाएं भी त्यागी नहीं हैं। वह गांवों में ही सीमित नहीं रहे बल्कि शहरों में जाकर भी अपने उत्पाद बेच रहे हैं। कानपुर देहात के एक गांव में रहने वाले जौनसारी जनजाति के रामखिलावन के अनुसार, समाज में अनुसूचित वर्ग की जातियां तो हमें लगभग पूरी तरह स्वीकार करने लगी हैं। कई बार तो उच्च जातियां भी नहीं हिचकतीं। हमें सामाजिक समारोहों में विभिन्न कार्यों से बुलाया जाता है। भोजन आदि कराया जाता है, काम के बदले में धन भी मिलता है। सामाजिक ढांचे में उनकी स्वीकार्यता की बात यहीं खत्म नहीं होती। कई गांवों में उनके लड़के-लड़कियों का विवाह अन्य जातियों में भी हुआ है। यहां भी माध्यम बनी है कला। एक वैवाहिक रिश्ते का आधार महज इसलिये बन गया कि लड़की के पिता जो रस्सी बनाते थे, लड़का अपनी दुकान पर बेचा करता था। बाद में यह रिश्ता और मजबूत बन गया। उत्पादन और बिक्री बढ़ने से दोनों परिवार और समृद्ध हो गए। इस तरह की सफल कहानियां कई हैं जो अच्छे संकेत दे रही हैं कला संरक्षण के भविष्य का।

यहां भी देखिए मेरा यह आर्टिकल-
http://vichar.bhadas4media.com/tera-mera-kona/799-2010-11-24-03-18-22.html

Wednesday, October 6, 2010

आर्ट वर्ल्ड में करोड़ों की बात

आर्ट वर्ल्ड में एक बार फिर बूम है। रिसेशन के बाद आर्ट मार्केट ने उबरने में बेशक समय लिया, लेकिन सिचुएशन ज्यादा अच्छी हो गई। गैलरीज़ में भीड़ जुट रही है और इसीलिये, रिसेशन में कदम पीछे खींचने वाले आर्टिस्ट अपना काम निकाल रहे हैं। भरपूर काम है उनके पास, पैसा भी खूब मिल रहा है। पैसा ही इस दुनिया में सक्सेस का पैमाना है। प्रोफेशनल होकर बात की जाए तो करोड़ का आंकड़ा छूने वाले आर्टिस्ट यहां सबसे सक्सेसफुल है। लाख और हजार में अपनी कला की कीमत पाने वाले सेकेंड और थर्ड। ऊपर से बेहद छोटी सी दिखने वाली कला की दुनिया असल में बहुत बड़ी है और इतना ही बड़ा है आर्ट मार्केट। करोड़ों डॉलर्स का है इसका आकार और यह पूरी दुनिया में फैला है। बहुत कम लोग जानते होंगे कि अन्य बाजारों की तरह आर्ट मार्केट में भी बिजनेस स्टंट अपनाए जाते हैं। अन्य बाजारों की तरह यहां भी इंटरनेट जैसे एडवांस टूल यूज होते हैं। गैलरीज में आर्ट एग्जीबिशन से भी कमाई होती है। आर्टिस्ट भी अन्य बिजनेसमैन्स की तरह मार्केट पर नजर रखते हैं और स्टेटजी अपनाते हैं। सीधे खरीदने वाले बायर्स के अलावा उन तक आर्ट पहुंचाने वाले मीडिएटर्स भी होते हैं जो सेल में कुछ हिस्सा लेते हैं।
ऐसे में यह सवाल उठता है कि कला का मूल उद्देश्य क्या पैसा है? बिल्कुल नहीं, लेकिन आर्टिस्ट को भी तो जीना है। खास बात यह है कि आर्टिस्ट का कद उसकी कला की कीमत से होता है। हालांकि आज भी कई आर्टिस्ट पैसा कमाने के लिए नहीं बल्कि सैटिस्फैक्शन पाने को कला सृजन करते हैं पर मोस्टली इस विचार पर चलते हैं कि जीना है तो पैसा कमाना है और समझदारी से ज्यादा कमाई हो जाए तो इसमें हर्ज क्या है? फिर पेंटिंग की कॉस्ट से ही कद मापा जा रहा है तो यह सब मजबूरी भी हो जाता है। पेंटिंग्स की कीमत से हिसाब से एसएच रजा भारत के सबसे बड़े आर्टिस्ट हैं क्योंकि उनकी सौराष्ट्र टाइटिल वाली पेंटिंग 16 करोड़ 53 लाख में बिकी। एफएन सूजा सेकेंड और तैयब मेहता थर्ड हैं जिनकी पेंटिंग्स 11 करोड़ 25 लाख और आठ करोड़ 20 लाख में बिकी हैं। वूमैन आर्टिस्ट आफ द सेंचुरी अमृता शेरगिल की विलेज सीन 6 करोड़ 90 लाख में खरीदी गई। इंडियन पिकासो कहे जाने वाले मकबूल फ़िदा हुसैन का स्थान सातवां है। हुसैन की पेंटिंग बैटल बिटवीन गंगा एंड यमुनाः महाभारत की कीमत 6 करोड़ 50 लाख मिली है। इसी नजर से भारती खेर, वीएस गायतोंडे, सुबोध गुप्ता और जहांगीर सबावाला भी बड़े कलाकार हैं। यह सब टॉप टेन में हैं। सबावाला की एक पेंटिंग जून 2010 में एक करोड़ 17 लाख में बिकी है, रजा की सौराष्ट्र को भी इसी महीने में 16 करोड़ 73 लाख में बेचा गया। दोबारा बिक्री में 20 लाख अधिक मिले, इसलिये लोगों के लिए आर्ट आइटम्स खरीदना इन्वेस्टमेंट और बिजनेस भी है। कीमत के हिसाब से इंडिया के टॉप 25 आर्ट आइटम्स इन्हीं कलाकारों के हैं। कला की दुनिया में भी इंटरनेट का जमाना है इसलिये ही तो सूजा और सबावाला की आर्ट को करोड़ों की कीमत आनलाइन सेल से मिली है। इसी का रिजल्ट है कि एक आनलाइन सेल में चार करोड़ 20 लाख के आफर तो सिर्फ ब्लैकबेरी और आईफोन्स के जरिए मिले। रिसेशन के झटके से उबरने के बाद आर्ट वर्ल्ड में रौनक लौट चुकी है। गैलरीज फिर आर्ट वर्क से सज रही हैं। नहीं तो, मुंबई की फेमस जहांगीर आर्ट गैलरी में भी भीड़ छंट गई थी। चार साल के लंबे इंतजार के बाद एग्जीबिशन का मौका मिलने के बाद भी तमाम कलाकार वहां नहीं पहुंचे थे। जो पहुंचे, वो खाली हाथ लौट आए। यह समय उनके डंप हुए आर्ट वर्क के बिकने का है। अक्टूबर से मार्च तक का समय तो वैसे भी आर्टिस्ट्स के लिए बेहद व्यस्तता का होता है। ऐसे में फिर कहीं से खबर आ जाए कि किसी आर्टिस्ट का काम करोड़ों में बिका है तो चौंकिएगा नहीं, इतनी महंगी बिक्री के एक्जाम्पल्स पहले से हैं।

Tuesday, September 28, 2010

आइये बनाएं मेरा भारत महान

एक बार फिर चुनौती सामने खड़ी है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले से श्रीराम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का विवाद डरा रहा है। सत्ता हो या आम जन, हर जगह खौफ है कि कहीं सांप्रदायिक सदभाव छिन्न-भिन्न न हो जाए। बाबरी मस्जिद को ढहे दो दशक से ज्यादा समय हुआ। विभिन्न धर्म और जातियों के संगम वाले इस देश की पावन गंगा-यमुना नदियों में न जाने कितना पानी बह गया। जो उस समय बच्चे थे, वो बड़े हो गए, जवान थे, वो बूढ़े और कट्टरता की मिसाल माने जाने वाले कितने बूढ़े जमाने से विदा हो गए। उस समय जो दंगे हुए, उससे तमाम लोगों को सबक मिला। दोनों धर्मों के ज्यादातर लोगों ने मान लिया कि दंगा हुआ तो शिकार हम बनेंगे और रोटियां सियासत के खिलाड़ियों की सिकेंगी। भीषण दंगों ने जो सबक दिया जिसका नतीजा हुआ कि आगरा, बनारस और अलीगढ़ जैसे घोर सांप्रदायिक करार शहर शांत हो गए। कहीं दंगे हुए तो भी छिटपुट। मजहबों की जंग शांत करने के लिए हर जगह दोनों तरफ के लोग साथ आ गए। बनारस का मदनपुरा, अलीगढ़ की सिविल लाइंस या फिर आगरे का मंटोला, सभी ने सबक लिया। पिछले दिनों लखनऊ गई तो हाईकोर्ट के फैसले के मद्देनजर ऐशबाग जाने वाला एक रास्ता रोक रखा था पुलिस ने। वहां दंगा नहीं होता, कभी कटुता होती है तो बात न बिगड़ जाए इसलिये पुलिस की सतर्कता थी यह। और तो और... खबरें हैं कि फैजाबाद और यहां तक कि अयोध्या में भी दोनों वर्गों के लोग शांति चाहते हैं। यह होना भी चाहिये। देश में कॉमनवेल्थ गेम्स शुरू होने वाले हैं, जरा हालात बिगड़े तो क्या होगा, कल्पना करना मुश्किल नहीं। दुर्भाग्य से संवेदनशील शहरों की श्रेणी में शुमार मुरादाबाद, बिजनौर जैसे शहर बाढ़ की तबाही झेल रहे हैं। आगरा-मथुरा में कालिंदी क्रूर है और आसपास के इलाके उसके पानी से लबालब चल रहे हैं। जहां बाढ़ उतार पर है, वहां भी असर कई दिन तक चलेगा। बाढ़ के बाद बीमारियां पैर पसारेंगी, तब कुछ गलत हुआ तो क्या होगा?
हम मिलजुल कर रहते आए हैं। तमाम मिसालें हैं जब संकट की घड़ी में हम हिंदू या मुस्लिम नहीं देखते और मानवता की कहानियां रच देते हैं। बाबर को ही हम क्यों याद करते हैं, जबकि तमाम मुस्लिम शासकों और हिंदू राजाओं ने दूसरे धर्मों का सम्मान करने की मिसालें खड़ी की हैं। हम बनारस में ज्ञानवापी-काशी विश्वनाथ मंदिर और मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि-ईदगाह की तरफ देखते हैं लेकिन उन शहरों को क्यों भूल जाते हैं जहां मंदिर में घंटियां एवं मस्जिद की अजान साथ-साथ सुनाई देती हैं। कहीं तो कहीं तो आपसी तालमेल इतना है कि दोनों धर्मों के लोगों ने समझदारी से पूजा और नमाज के लिए अलग-अलग समय तय कर रखा है। राजस्थान में अजमेर शरीफ, गुजरात में अहमदाबाद की करीबी इमामुद्दीन साहब की दरगाह और मुंबई में हाजी अली की दरगाह पर जितने मुस्लिम आते हैं, हिंदुओं की संख्या भी उससे कम नहीं होती होगी। केरल में सबरीमाला तीर्थ जाने वाले श्रद्धालुओं में बड़ी तादात वावार मस्जिद के सामने शीश झुकाती है। मान्यता है कि मस्जिद गए बिना अयप्पा मंदिर की यात्रा का पुण्य अधूरा है। अशांत कश्मीर में हिंदुओं की हालत चाहें कितनी ही खराब हो लेकिन वहीं पुलवामा जिले के एक गांव में एक मंदिर ऐसा है जहां हिंदुओं का हवन चलता है और दूसरे हिस्से में मुसलमान भाई नमाज अदा करते हैं। घाटी से पलायन कर चुके कश्मीरी पंडितों में तमाम ऐसे हैं जो हजरत सैय्यद अकबरूद्दीन के सालाना उर्स में हाजिरी लगाने पहुंचते हैं। फिर हम क्यों भयभीत हैं। मनोविज्ञान के एक अध्ययन का निष्कर्ष है कि दंगा करने वाले लोगों में बड़ी संख्या उन लोगों की भी होती है जो भयग्रस्त या हीनभावना के शिकार होते हैं। यह लोग सिर्फ इसलिये उग्र हो जाते हैं कि कहीं दूसरा पक्ष उन्हें लील न ले। यह लोग यदि चेत जाएं और प्रशासन उनमें छाया भय दूर कर दे तो चंद सिरफिरों को हम अपनी शांति को आग लगाने की इजाजत देने से बचेंगे। हम हिंदू-मुस्लिम बाद में हैं, भारतीय पहले हैं। जरूरत है कि फैसले को आसानी से स्वीकार करें। कितनी मुश्किल से गढ़ी है हमने देश की यह साझा संस्कृति इसे बचाने की जिम्मेदारी भी हमारी है। हम जानते हैं कि कोई भी चीज बनती मुश्किल से है पर नष्ट आसानी से हो जाती है। मौका है अपने देश को महान बनाने का, फिर कहेंगे मेरा भारत महान। इसी क्रम में इकबाल का शेर अर्ज़ है-
वतन की फिक्र कर नादां मुसीबत आने वाली है, तेरी बरबादियों के मश्वरे हैं आसमानों में।
ना समझोगे तो मिटजाओगे ऐ हिंदुस्तां वालों, तुम्हारी दास्तां तक न होगी दास्तानों में।।